01भस्माचल
कालिका पुराण कहता है कि इसी शिला पर कामदेव ने भगवान शिव की तपस्या भंग की, और शिव ने तीसरे नेत्र की अग्नि से उसे भस्म कर दिया। इसलिए इस पहाड़ी को भस्माचल भी कहते हैं। यहाँ शिव उमानन्द, अर्थात उमा के आनन्द, रूप में पूजे जाते हैं, क्योंकि कहा जाता है कि माता पार्वती को नदी का यह द्वीप प्रिय था। कचारी घाट से छोटी नाव लगभग दस मिनट में पहुँचाती है; सूखे महीनों में पानी उतरता है तो द्वीप के चारों ओर की चट्टानें दिखने लगती हैं।
02अहोम निर्माण, भूकम्प
वर्षों के दरबारी संघर्ष के बाद अहोम सिंहासन को फिर स्थिर करने वाले गदाधर सिंह ने 1694 ई. में गुवाहाटी के अपने बड़फुकन (प्रान्तपाल) गढ़गञा हान्दिकै के माध्यम से यह मन्दिर बनवाया। 1897 के असम के महाभूकम्प में इसका बड़ा भाग गिर गया। बाद में स्थानीय भक्तों ने इसे फिर बनवाया, और अहोम काल की कुछ पुरानी पत्थर की नक्काशी, जिनमें सूर्य, गणेश और विष्णु की आकृतियाँ हैं, चट्टानों और दीवारों पर बची है। यहाँ महाशिवरात्रि सबसे बड़ा पर्व है।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 1694 ई.अहोम राजा गदाधर सिंह की आज्ञा से मन्दिर बना।
- 1897 ई.असम के महाभूकम्प से मन्दिर को भारी क्षति; बाद में पुनर्निर्माण।
गुवाहाटी के कचारी और उज़ान बाज़ार घाट से दिन भर नावें चलती हैं; भारी बाढ़ में सेवा रुक जाती है।




