01लेखक शिव
मन्दिर कहता है कि जब राजा मन्दिर बनवा रहा था, सुधन्मन हिसाब रखता था। राजा ने बहियों पर सन्देह किया तो उसने प्रार्थना की, और शिव उसका रूप लेकर दरबार गए और हर आँकड़ा समझा दिया। इसलिए स्वामी एऴुत्तरिनाथर हैं, लिखना जानने वाले, और माता-पिता आज भी गर्भगृह के आगे धान बिछाकर बच्चे की उँगली से पहले अक्षर लिखवाते हैं। कहते हैं इन्द्र के श्वेत हाथी ऐरावत ने कुण्ड में स्नान कर शाप से मुक्ति पाई, जिससे देवता का दूसरा नाम आया। पंगुनि की 13, 14 और 15 तारीख़ को प्रातः की धूप ऊँचे लिंग तक पहुँचती है। अप्पर ने इन्नम्बूर पर चार पद गाए और सम्बन्दर ने एक। मार्गऴि तिरुवादिरै और ऐप्पसि का अन्नाभिषेक प्रमुख उत्सव हैं।
कुम्भकोणम से लगभग 8–10 किमी उत्तर-पश्चिम, पुलियञ्चेरि होकर तिरुप्पुरम्बियम मार्ग पर; कुम्भकोणम से बसें।




