01रामकोट के रक्षक
अयोध्या की परम्परा कहती है कि जब श्रीराम अपने धाम लौटे तो उन्होंने नगर की रक्षा के लिए हनुमान जी को यहीं छोड़ा, और हनुमान जी इसी टीले पर रहकर रामकोट की, राम जन्मभूमि के गढ़ की, रक्षा करते हैं। मन्दिर कोनों पर गोल बुर्जों वाले छोटे दुर्ग की तरह बना है। गर्भगृह में हनुमान जी अपनी माता अंजनी की गोद में बालक रूप में हैं, यह रूप कम मन्दिरों में मिलता है। तीर्थयात्री कहते हैं ‘पहले हनुमान, फिर राम’, और राम जन्मभूमि जाने से पहले यहाँ चढ़ते हैं।
02बैरागी और 1855
मन्दिर ने अपना वर्तमान रूप 18वीं शताब्दी में पाया, जब सशस्त्र अखाड़ों में संगठित रामानन्दी बैरागियों ने अवध के नवाबों के समय अयोध्या को अपना गढ़ बनाया, और नवाबी दरबार से अखाड़े को भूमि मिली। 1855 में शाह ग़ुलाम हुसैन के नेतृत्व में एक दल ने यह दावा करते हुए कि हनुमानगढ़ी के भीतर मस्जिद थी, उस पर आक्रमण किया; बैरागियों ने उन्हें पीछे धकेल दिया, और लड़ाई बाबरी ढाँचे की ओर फैल गई। अवध सरकार की जाँच और उस समय की अंग्रेज़ी रिपोर्टें इस घटना को दर्ज करती हैं। निर्वाणी अखाड़ा आज भी अपने महन्तों के माध्यम से मन्दिर चलाता है।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 1855हनुमानगढ़ी पर सशस्त्र आक्रमण को बैरागी विफल कर देते हैं।
हनुमानगढ़ी अयोध्या के बीच, राम जन्मभूमि मन्दिर से लगभग 1 किमी है; मंगलवार और शनिवार को भीड़ रहती है।




