01जो भक्त जा न सका
मन्दिर की कथा एक भक्त की है जो हर वर्ष पैदल तिरुमला जाता था, जब तक रोग ने उसे रोक नहीं दिया। बालाजी ने उसे स्वप्न में कहा कि वे पास ही हैं, और चिलकूर में एक बाँबी में मूर्ति मिली, खोदते समय कुदाल से उसमें से रक्त निकला। तब से मन्दिर उसके वंशानुगत पुजारियों का परिवार सँभालता है। विदेश के वीज़ा के लिए यहाँ प्रार्थना करने वाले विद्यार्थियों और परिवारों के कारण चिलकूर वीज़ा बालाजी कहलाने लगा है, और मन्दिर केवल इतना चाहता है कि भक्त श्रद्धा रखें और धन्यवाद देने लौटें।
02हुण्डी नहीं
चिलकूर में न दान-पेटी है, न विशेष दर्शन बिकता है; हर भक्त एक ही कतार में खड़ा होता है। पुजारी लम्बे समय से मानते आए हैं कि मन्दिर शासकीय नियन्त्रण और पैसे दोनों से मुक्त रहे, और यह इस प्रदेश के उन गिने-चुने बड़े मन्दिरों में है जो इस तरह चलते हैं। मन्नत ग्यारह प्रदक्षिणा से माँगी जाती है; पूरी होने पर भक्त लौटकर 108 परिक्रमा करता है। भीड़ के दिनों में परिक्रमा करती भीड़ नदी की तरह मन्दिर के चारों ओर बहती है।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- लगभग 16वीं शताब्दी (परम्परा)मूर्ति मिलती है और मन्दिर की स्थापना होती है।
हैदराबाद से लगभग 25 किमी पश्चिम, उस्मान सागर (गण्डीपेट) के पास। सप्ताहान्त में बहुत भीड़ रहती है; शुल्क वाला दर्शन नहीं है।




