आज भी खड़ा

भीमाकाली मन्दिर, सराहन

बुशहर राज्य की कुलदेवी, काठ-कुणी शैली के जुड़वाँ मीनार-मन्दिरों में, जिनमें लकड़ी और पत्थर की परतें बारी-बारी से चिनी हैं, छतें स्लेट की और द्वार चाँदी के। स्थानीय परम्परा इसे शक्तिपीठों में गिनती है।

निर्माण: लकड़ी और पत्थर की गुँथी परतों से बना पुराना मीनार-मन्दिर, कई शताब्दियाँ पुराना; उसी शैली का दूसरा मीनार 1940 के दशक में बनास्थान: हिमाचल प्रदेश (शिमला ज़िला, सतलुज के ऊपर सराहन)देवता: देवी भीमाकाली, बुशहर के राजाओं की कुलदेवी31.51° N, 77.80° E
  1. 1905
चित्र: Gerd Eichmann · CC BY 4.0

01शोणितपुर

स्थानीय परम्परा मानती है कि सराहन प्राचीन शोणितपुर है, बाणासुर की नगरी, जिसकी पुत्री उषा का विवाह, भागवत पुराण के अनुसार, श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध से हुआ। बुशहर के राजा अपना वंश उसी विवाह से जोड़ते थे और भीमाकाली को कुलदेवी मानते थे; उनकी राजधानी सराहन और सतलुज तट के रामपुर के बीच बदलती रही। भीमाकाली असुरों का संहार करने वाली दुर्गा का रूप मानी जाती हैं, और पहाड़ की परम्परा इस पीठ को शक्तिपीठों में गिनती है, यद्यपि यह अष्टादश स्तोत्र या पीठ निर्णय में नहीं आता।

02काठ-कुणी मीनार

यह मन्दिर काठ-कुणी शैली का सबसे सुन्दर बचा हुआ उदाहरण है, हिमालय की वह निर्माण-विधि जिसमें देवदार के शहतीर और सूखे पत्थर बिना गारे के बारी-बारी चिने जाते हैं, ताकि भूकम्प में दीवारें लचक जाएँ। पुराना मीनार 1905 के भूकम्प में क्षतिग्रस्त हुआ, फिर भी खड़ा है और पर्वों पर खुलता है; उसके पास 1940 के दशक में दूसरा मीनार बना, और देवी अब उसी की ऊपरी मंज़िल पर विराजती हैं, जहाँ आँगनों और चाँदी-मढ़े द्वारों से होकर पहुँचते हैं। परिसर में रघुनाथजी और नृसिंह के अलग मन्दिर हैं। चमड़े के जूते और पेटी बाहर छोड़ी जाती है और भीतर टोपी पहनी जाती है।

इस स्थान की जीवन-गाथा

  1. 1905काँगड़ा का महाभूकम्प पुराने मीनार को क्षति पहुँचाता है, पर वह खड़ा रहता है।
दर्शन और यात्रा

सराहन शिमला से लगभग 170 किलोमीटर है, हिन्दुस्तान–तिब्बत मार्ग पर ज्यूरी के ऊपर। दशहरा और नवरात्रियाँ यहाँ के मुख्य पर्व हैं; द्वार पर टोपियाँ मिलती हैं।