01एक टीला, तीन नगर
हरियाणा पुरातत्व विभाग के आर. एस. बिष्ट ने 1974 से बनावली खोदा। उन्हें तीन परतें मिलीं। पहली, कालीबंगा के आरम्भिक स्तर जैसी, कच्ची ईंटों के घरों और विशेष मृद्भाण्डों वाला गाँव थी। उसके ऊपर परकोटे, खाई और प्रमुख परिवारों के भीतरी घेरे वाला परिपक्व हड़प्पा नगर उठा, यद्यपि यहाँ भीतरी घेरा नगर से अलग न होकर उससे जुड़ा था। इसकी गलियाँ तिरछी होकर फैलती हैं। अन्तिम, उत्तर हड़प्पा, चरण निर्धन था। मुहरें, बाट, सोने और कार्नेलियन के मनके और हड़प्पा मृद्भाण्ड दिखाते हैं कि नगर सिन्धु और सरस्वती की व्यापक सभ्यता का अंग था।
02मिट्टी का हल और अग्निवेदियाँ
बनावली से अब तक किसी हड़प्पा स्थल पर मिला सबसे सुन्दर मिट्टी का हल-प्रतिरूप निकला, हथेली में आ जाए इतना छोटा, फाल और हरिस स्पष्ट बने हुए। कालीबंगा के जुते खेत के साथ यह उस खेती को दिखाता है जिससे ये नगर पलते थे, ऐसे मैदान पर जहाँ आज भी वर्ष में दो फ़सलें उगती हैं। कालीबंगा और लोथल जैसी अग्निवेदियाँ एक बड़े अर्धवृत्ताकार भवन में मिलीं, जो सरस्वती प्रदेश में अग्नि-अनुष्ठान की निरन्तरता की याद दिलाती हैं। बनावली फ़तेहाबाद से लगभग 15 किमी है; उत्खनित टीला संरक्षित है, पर सतह पर आज देखने को कम है।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- लगभग 2500 ई.पू.पहले के गाँव के ऊपर परकोटे वाला परिपक्व हड़प्पा नगर बनता है।
- 1974–77हरियाणा पुरातत्व विभाग के लिए आर. एस. बिष्ट स्थल का उत्खनन करते हैं।




