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स्वर्णपुरीश्वरर मन्दिर, कडुवाय्क्करैप्पुत्तूर (आण्डान्कोयिल)

कडुवाय नदी किनारे का वह मन्दिर जिसे एक मन्त्री ने राहगीरों से माँगे पत्थरों से बनाया, जिसके लिए उसका सिर गया और फिर जीवन लौटा। अप्पर ने इसे गाया।

निर्माण: पाँच तल के राजगोपुरम वाला चोल शैली का मन्दिर, नगरत्तार समाज द्वारा पुनर्निर्मितस्थान: तमिलनाडु (तिरुवारूर ज़िला)देवता: भगवान शिव स्वर्णपुरीश्वरर रूप में; देवी स्वर्णाम्बिका (शिवाम्बिका)10.88° N, 79.42° E
चित्र: பா.ஜம்புலிங்கம் · CC BY-SA 4.0

01कण्डदेवर का मन्दिर

कडुवाय कुडमुरुट्टि नदी का पुराना नाम है, और उसके तट का गाँव कडुवाय्क्करैप्पुत्तूर है। मन्दिर की कथा कहती है कि राजा मुचुकुन्द के मन्त्री कण्डदेवर शिव-दर्शन के बिना भोजन नहीं करते थे और एक रात यहाँ भूखे पड़े रहे; स्वप्न में स्वामी ने बताया कि वे कहाँ मिलेंगे, और कण्डदेवर ने राहगीरों से माँगे पत्थरों और गारे से लिंग पर मन्दिर उठाया। राजा ने इसे वसूली समझकर उनका सिर कटवा दिया, फिर पछताकर स्वयं प्राण देने को तैयार हुआ, और शिव ने प्रकट होकर मन्त्री को जीवित कर दिया। पाँचवें तिरुमुरै में अप्पर का पद स्थान को कडुवाय्क्करै तेन्पुत्तूर कहता है और हर छन्द में स्वामी के दर्शन के लिए आभार प्रकट करता है। देवी के देवालय के सामने की छत पर बारह राशियाँ हैं।

दर्शन और यात्रा

कुम्भकोणम–वलंगैमान–कुडवासल बस मार्ग पर, कुम्भकोणम से लगभग 13 किमी। चित्तिरै की 11, 12 और 23 तारीख़ को सूर्य गर्भगृह तक पहुँचता है।