चित्र: Raja Ravi Varma · Public domain
ऋषि

महर्षि विश्वामित्र

गायत्री मन्त्र के द्रष्टा

वैदिक काल और त्रेता युग (पारंपरिक गणना)

राजा गाधि के वंश में कौशिक नाम से जन्मे विश्वामित्र तप से ब्रह्मर्षि बने। वे ऋग्वेद के तीसरे मण्डल के द्रष्टा हैं, जिसमें गायत्री मन्त्र है, और वे बालक राम और लक्ष्मण को अपने यज्ञ की रक्षा के लिए वन ले गए।

“तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्॥”Rigveda 3.62.10

01राजा से ब्रह्मर्षि

बालकाण्ड पूरी कथा कहता है। राजा विश्वरथ सेना लेकर वसिष्ठ के आश्रम आए और कामधेनु चाही। वसिष्ठ के ब्रह्मतेज ने हर अस्त्र लौटा दिया। राजा ने समझा कि तप बड़ी शक्ति है, और उसके लिए राज्य छोड़ दिया। मेनका उनका तप भंग करने भेजी गई और कुछ समय के लिए सफल भी हुई। वे फिर तप में बैठे। सहस्रों वर्षों के बाद ब्रह्माजी ने उन्हें ब्रह्मर्षि कहा, और उनके पुराने प्रतिद्वन्द्वी वसिष्ठ ने भी उन्हें इसी नाम से स्वीकार किया।

02गायत्री और रामायण

ऋग्वेद 3.62.10, गायत्री, हर उपनयन में दिया जाने वाला मन्त्र है। इसके द्रष्टा विश्वामित्र हैं। रामायण में वे दशरथ से सोलह वर्ष के राम को माँगते हैं, राम-लक्ष्मण को सिद्धाश्रम ले जाते हैं, बला और अतिबला विद्या तथा दिव्यास्त्र सिखाते हैं, और ताड़का, सुबाहु तथा यज्ञ भंग करने वाले राक्षसों का नाश देखते हैं। फिर वे उन्हें मिथिला ले जाते हैं, जहाँ राम शिवधनुष तोड़कर सीता को पाते हैं। मेनका से उनकी पुत्री शकुन्तला थी, इस प्रकार वे उन भरत के नाना हैं जिनके नाम से भारत कहलाता है।

सूर्यवंश (इक्ष्वाकु वंश)
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“तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्॥”

Rigveda 3.62.10