01रोकी गई पेंशन
अंतिम पेशवा बाजीराव द्वितीय ने 1818 में कंपनी के आगे समर्पण किया और उन्हें आठ लाख रुपये वार्षिक पेंशन देकर गंगा तट पर बिठूर भेज दिया गया। पुत्र न होने से उन्होंने 1827 में धोंडू पंत को गोद लिया। 28 जनवरी 1851 को बाजीराव के देहांत पर कंपनी ने उत्तराधिकारी को पेंशन देने से मना कर दिया। नाना ने अपने प्रतिनिधि अज़ीमुल्ला ख़ान को लंदन भेजकर पैरवी कराई, पर अपील विफल रही। वे बिठूर में परिवार की निजी जागीर पर रहते रहे और ऊपर से कानपुर के अंग्रेज़ अफ़सरों से मेल बनाए रहे।
02कानपुर, 1857
जून 1857 में कानपुर के सिपाही उठे और नाना साहब उनके नेता बने। 6 जून से जनरल व्हीलर की मोर्चाबंदी घिरी रही और 25 जून को शर्तों पर उसने समर्पण किया। 27 जून को सत्तीचौरा घाट पर नावों में चढ़ते समय गोलीबारी शुरू हुई और अधिकांश पुरुष मारे गए। बंदी बनाई गई स्त्रियाँ और बच्चे बीबीघर में रखे गए और 15 जुलाई को, हैवलॉक की सेना के निकट आते ही, मार डाले गए; यह आदेश किसने दिया, इस पर आज भी मतभेद है। 17 जुलाई को हैवलॉक ने कानपुर लिया और फिर नील ने नगर तथा आसपास के गाँवों पर प्रतिशोध की कार्रवाई की। 1 जुलाई को बिठूर में नाना को पेशवा घोषित किया गया था।




