चित्र: Unknown authorUnknown author · Public domain
स्वतंत्रता सेनानी

नाना साहब पेशवा

अंतिम पेशवा के दत्तक उत्तराधिकारी

19 मई 1824 – 1859 के बाद (अंत अज्ञात)

पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र धोंडू पंत ने, कंपनी द्वारा पिता की पेंशन रोके जाने के बाद, 1857 में कानपुर के विद्रोह का नेतृत्व किया। 1859 में वे नेपाल की तराई में चले गए और फिर अंग्रेज़ों के हाथ कभी नहीं आए।

01रोकी गई पेंशन

अंतिम पेशवा बाजीराव द्वितीय ने 1818 में कंपनी के आगे समर्पण किया और उन्हें आठ लाख रुपये वार्षिक पेंशन देकर गंगा तट पर बिठूर भेज दिया गया। पुत्र न होने से उन्होंने 1827 में धोंडू पंत को गोद लिया। 28 जनवरी 1851 को बाजीराव के देहांत पर कंपनी ने उत्तराधिकारी को पेंशन देने से मना कर दिया। नाना ने अपने प्रतिनिधि अज़ीमुल्ला ख़ान को लंदन भेजकर पैरवी कराई, पर अपील विफल रही। वे बिठूर में परिवार की निजी जागीर पर रहते रहे और ऊपर से कानपुर के अंग्रेज़ अफ़सरों से मेल बनाए रहे।

02कानपुर, 1857

जून 1857 में कानपुर के सिपाही उठे और नाना साहब उनके नेता बने। 6 जून से जनरल व्हीलर की मोर्चाबंदी घिरी रही और 25 जून को शर्तों पर उसने समर्पण किया। 27 जून को सत्तीचौरा घाट पर नावों में चढ़ते समय गोलीबारी शुरू हुई और अधिकांश पुरुष मारे गए। बंदी बनाई गई स्त्रियाँ और बच्चे बीबीघर में रखे गए और 15 जुलाई को, हैवलॉक की सेना के निकट आते ही, मार डाले गए; यह आदेश किसने दिया, इस पर आज भी मतभेद है। 17 जुलाई को हैवलॉक ने कानपुर लिया और फिर नील ने नगर तथा आसपास के गाँवों पर प्रतिशोध की कार्रवाई की। 1 जुलाई को बिठूर में नाना को पेशवा घोषित किया गया था।

पुणे के पेशवा
राजवंश · 1713–1818 ई.पुणे के पेशवापेशवा छत्रपतियों के वंशानुगत प्रधानमन्त्री थे, और 1713 से 1818 तक पुणे से मराठा राज्य उन्हीं के हाथ में रहा। बाजीराव प्रथम और उनके पुत्र नानासाहेब के समय मराठे भारत की सबसे बड़ी शक्ति बने, फिर 1761 का पानीपत आया और अंग्रेज़ों से युद्ध, जिनमें 1818 में यह वंश समाप्त हुआ।पढ़ें →