‘सुश्रुत संहिता’ जीवित त्वचा के एक टुकड़े से नाक फिर बनाने का वर्णन करती है, और अंग्रेज़ शल्य-चिकित्सकों ने माथे की त्वचा वाली विधि भारतीय वैद्यों से सीखी: 1794 में पुणे से इसकी सूचना छपी और इंग्लैंड में इसे पहली बार 1814 में जोसेफ़ कार्प्यू ने किया।
प्रमाण
- ‘सुश्रुत संहिता’, सूत्रस्थान 16, गाल की त्वचा के टुकड़े से कटी नाक जोड़ने की विधि देती है।
- ‘जेंटलमैन्स मैगज़ीन’ के अक्टूबर 1794 अंक में ‘बी. एल.’ के हस्ताक्षर से एक पत्र छपा, जिसमें पुणे के पास कावसजी नाम के बैलगाड़ीवान की कटी नाक के ऑपरेशन का वर्णन था।
- जोसेफ़ कार्प्यू ने 1816 में लंदन में दो सफल ऑपरेशनों का वर्णन छापा और भारतीय विधि को श्रेय दिया।
01पुणे के कुम्हार शल्य-चिकित्सक
कावसजी 1792 के मैसूर युद्ध में अंग्रेज़ी सेना के लिए बैल हाँकता था। टीपू सुल्तान के सैनिकों ने उसे पकड़कर उसकी नाक और एक हाथ काट दिया। पुणे के पास कुम्हार जाति के एक वैद्य ने माथे से नीचे मोड़ी गई त्वचा से उसकी नाक फिर बना दी, और अंग्रेज़ अफ़सर देखते रहे। ठीक हुए चेहरे के चित्र के साथ लंदन में छपे पत्र ने यूरोपीय शल्य-चिकित्सकों को इस काम में लगा दिया। यह कला राजदरबारों और विद्यालयों से बाहर, भारतीय परिवारों में सदियों तक बची रही थी।
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आचार्य सुश्रुत
सुश्रुत ने काशी में दिवोदास धन्वन्तरि से शल्य-विद्या सीखी और उसे सुश्रुत संहिता में लिखा। इस ग्रन्थ में जीवित त्वचा के टुकड़े से नाक बनाने, मोतियाबिन्द की शल्यक्रिया और सौ से अधिक शल्य-यन्त्रों का वर्णन है।

आचार्य चरक
चरक ने प्राचीन अग्निवेश तन्त्र का प्रतिसंस्कार कर चरक संहिता बनाई, जो आयुर्वेद की काय-चिकित्सा का मूल ग्रन्थ है। भारत के वैद्य आज भी उसकी शपथ लेते हैं और रोगी-परीक्षा की उसकी पद्धति अपनाते हैं।