स्तंभ सचमुच जंग से बहुत अच्छी तरह बचा है, और इसका कारण खोज लिया गया है: इसके लोहे में फ़ॉस्फ़ोरस अधिक है और यह भट्ठी के लोहे के टुकड़ों को गर्म करके जोड़ने से बना है, जिससे सतह पर एक पतली रक्षक परत बन जाती है। यह गुप्त युग के लोहारों की असली उपलब्धि है, और यह ज्ञात है, खोई हुई नहीं।
प्रमाण
- स्तंभ लगभग 7.2 मीटर ऊँचा और लगभग 6 टन भारी है; इसका लेख राजा चन्द्र का नाम लेता है, जिन्हें सामान्यतः चन्द्रगुप्त द्वितीय माना जाता है।
- आईआईटी कानपुर के आर. बालसुब्रमण्यम ने ‘कोरोज़न साइंस’ (2000) में दिखाया कि इसमें अधिक फ़ॉस्फ़ोरस एक रक्षक परत (मिसावाइट) बनने में मदद करता है।
01जंग-रोधी, जंग-मुक्त नहीं
ध्यान से देखिए तो कुछ जंग दिखेगा, विशेषकर नीचे के भाग में, जो कभी ज़मीन में दबा था और जहाँ लोग स्तंभ को बाँहों में भरते थे। बाक़ी सतह पर एक काली, पतली परत है जो आगे का क्षरण धीमा करती है। धातुविदों ने पाया कि लोहारों ने भट्ठी का लोहा टुकड़ा-टुकड़ा गर्म करके पीटा, जिससे धातु में धातुमल के कण और फ़ॉस्फ़ोरस रह गए। दिल्ली की अपेक्षाकृत सूखी हवा भी सहायक है। ‘खोया हुआ रहस्य’ कहना उन लोहारों को कम आँकना है। उनकी विधि आज प्रयोगशाला की रिपोर्ट में लिखी जा सकती है, और यही बड़ी बात है।
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दिल्ली का लौह स्तम्भ
लगभग छह टन का 7.2 मीटर ऊँचा पिटवाँ लोहे का स्तम्भ, जो विष्णु के ध्वज के रूप में बना और सोलह शताब्दियों बाद भी लगभग जंग-रहित है।

चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य
चन्द्रगुप्त द्वितीय ने मालवा और गुजरात में तीन सौ वर्ष के शक शासन का अन्त किया, पश्चिमी बन्दरगाहों को गुप्त राज्य में मिलाया और विक्रमादित्य की उपाधि ली। उनका शासन गुप्त युग का मध्याह्न है, जिससे होकर फाह्यान गुज़रे।
