ब्रह्मवादी पूछते हैं: कारण क्या है, ब्रह्म? हम कहाँ से उत्पन्न हुए, किससे जीते हैं, कहाँ टिके हैं? क्या काल, स्वभाव, नियति, यदृच्छा, भूत, योनि या पुरुष कारण है? इनमें से कोई अकेला नहीं। ध्यान में डूबकर उन्होंने देव की अपनी शक्ति देखी, अपने गुणों में छिपी, जो इन सब कारणों पर शासन करती है। जगत् को चक्र और पाँच धाराओं वाली नदी के रूप में दिखाया गया है। तीन हैं, भोक्ता, भोग्य और प्रेरक, और तीनों ब्रह्म हैं। जैसे लकड़ी में छिपी अग्नि मन्थन से दिखती है, वैसे ओंकार और देह के मन्थन से आत्मा दिखता है। वह हममें वैसे है जैसे दूध में घी, तिल में तेल, स्रोत में जल।
oṃ brahmavādino vadanti | kiṃ kāraṇaṃ brahma kutaḥ sma jātā jīvāma kena kva ca sampratiṣṭhā | adhiṣṭhitāḥ kena sukhetareṣu vartāmahe brahmavido vyavasthām
ब्रह्मवादी आपस में पूछते हैं: क्या ब्रह्म ही कारण है? हम कहाँ से उत्पन्न हुए? किसके बल से जीते हैं और अंत में कहाँ प्रतिष्ठित होते हैं? किसके अधीन रहकर हम सुख और दुःख में बरतते हैं? हे ब्रह्मज्ञानियो, यह व्यवस्था हमें बताइए।
क्या काल को कारण मानें, या स्वभाव को, नियति को, संयोग को, पंचभूतों को, योनि को या पुरुष को? इनका मेल भी कारण नहीं हो सकता, क्योंकि उसे जोड़ने वाला कोई आत्मा चाहिए। और जीवात्मा भी स्वयं सुख दुःख के अधीन होने से समर्थ नहीं है।
ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन्देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम् । यः कारणानि निखिलानि तानि कालात्मयुक्तान्यधितिष्ठत्येकः
te dhyānayogānugatā apaśyandevātmaśaktiṃ svaguṇairnigūḍhām | yaḥ kāraṇāni nikhilāni tāni kālātmayuktānyadhitiṣṭhatyekaḥ
ध्यानयोग में स्थित होकर उन ऋषियों ने परमदेव की अपनी शक्ति का दर्शन किया, जो अपने ही गुणों से ढकी हुई है। वही एक परमेश्वर काल से लेकर आत्मा तक उन सब कारणों का अधिष्ठाता है।
हम उसे एक चक्र के रूप में जानते हैं: एक नेमि, तीन गुणों का त्रिवृत घेरा, सोलह सिरे, पचास अरे और बीस प्रति अरे, आठ आठ के छह समूह, अनेक रूपों वाली एक डोरी, तीन मार्ग, और पुण्य पाप इन दो निमित्तों से उपजा एक मोह।
हम उसे एक नदी के रूप में भी जानते हैं: पाँच इंद्रियाँ उसकी धाराएँ हैं, पाँच भूत उसके उग्र मोड़, पाँच प्राण उसकी लहरें, और पाँचों ज्ञानों का मूल मन उसका उद्गम है। उसमें पाँच भँवर हैं, पाँच दुःखों का वेगवान प्रवाह है, पचास भेद और पाँच पर्व हैं।
सबको जीवन देने वाले और सबके आश्रय इस विशाल ब्रह्मचक्र में हंस रूपी जीव भटकता रहता है, जब तक वह स्वयं को प्रेरक परमेश्वर से अलग मानता है। जब उसी की कृपा प्राप्त होती है, तब वह अमृतत्व को पाता है।
udgītametatparamaṃ tu brahma tasmiṃstrayaṃ supratiṣṭhā'kṣaraṃ ca | atrāntaraṃ brahmavido viditvā līnā brahmaṇi tatparā yonimuktāḥ
वेदों ने इसी को परब्रह्म कहकर गाया है। इसमें भोक्ता, भोग्य और प्रेरक, ये तीनों प्रतिष्ठित हैं, और यही अविनाशी आधार है। इसके भीतर के रहस्य को जानकर ब्रह्मवेत्ता उसी में लीन और तत्पर होकर जन्म के बंधन से मुक्त हो जाते हैं।
परमेश्वर क्षर और अक्षर, व्यक्त और अव्यक्त से मिले हुए इस सम्पूर्ण जगत का भरण करते हैं। जीवात्मा स्वयं को भोक्ता मानने के कारण असमर्थ होकर बँध जाता है। उस परमदेव को जानकर वह सब पाशों से छूट जाता है।
दो अजन्मे हैं: एक ज्ञानी ईश्वर, दूसरा अज्ञानी जीव जो ईश्वर नहीं है। एक और अजन्मी प्रकृति है, जो भोक्ता और भोग्य से जुड़ी है। आत्मा अनंत, विश्वरूप और अकर्ता है। जब कोई इन तीनों को जान लेता है, तो यही ब्रह्म है।
क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरः क्षरात्मानावीशते देव एकः । तस्याभिध्यानाद्योजनात्तत्त्वभावाद्भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः
kṣaraṃ pradhānamamṛtākṣaraṃ haraḥ kṣarātmānāvīśate deva ekaḥ | tasyābhidhyānādyojanāttattvabhāvādbhūyaścānte viśvamāyānivṛttiḥ
प्रधान अर्थात प्रकृति क्षर है, और हर अर्थात परमेश्वर अमृत और अक्षर हैं। वही एक देव क्षर प्रकृति और जीव दोनों पर शासन करते हैं। उनका ध्यान करने से, उनसे जुड़ने से और उनके भाव में स्थित होने से अंत में सारी विश्वमाया निवृत्त हो जाती है।
परमदेव को जान लेने पर सब बंधन कट जाते हैं, क्लेश क्षीण होने पर जन्म और मृत्यु का अंत हो जाता है। उनका ध्यान करने से देह छूटने पर साधक तीसरी अवस्था, विश्व के ऐश्वर्य को पाता है, और फिर केवल, पूर्णकाम होकर स्थित होता है।
एतज्ज्ञेयं नित्यमेवात्मसंस्थं नातः परं वेदितव्यं हि किञ्चित् । भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा सर्वं प्रोक्तं त्रिविधं ब्रह्ममेतत्
etajjñeyaṃ nityamevātmasaṃsthaṃ nātaḥ paraṃ veditavyaṃ hi kiñcit | bhoktā bhogyaṃ preritāraṃ ca matvā sarvaṃ proktaṃ trividhaṃ brahmametat
यही जानने योग्य है, जो सदा अपने ही भीतर स्थित है। इससे परे जानने को कुछ भी नहीं। भोक्ता, भोग्य और प्रेरक को समझ लेने पर सब कुछ कह दिया गया। यही त्रिविध ब्रह्म है।
वह्नेर्यथा योनिगतस्य मूर्तिर्न दृश्यते नैव च लिङ्गनाशः । स भूय एवेन्धनयोनिगृह्यस्तद्वोभयं वै प्रणवेन देहे
vahneryathā yonigatasya mūrtirna dṛśyate naiva ca liṅganāśaḥ | sa bhūya evendhanayonigṛhyastadvobhayaṃ vai praṇavena dehe
अपनी योनि अर्थात अरणि में छिपी अग्नि का रूप दिखाई नहीं देता, फिर भी उसका सूक्ष्म रूप नष्ट नहीं होता; ईंधन को मथकर वह फिर प्रकट हो जाती है। उसी प्रकार आत्मा और ब्रह्म दोनों ओंकार के द्वारा इसी देह में ग्रहण किए जाते हैं।
जैसे तिल में तेल, दही में घी, सोतों में जल और अरणियों में अग्नि रहती है, वैसे ही जो साधक सत्य और तप से उसे खोजता है, वह आत्मा को अपने ही भीतर पा लेता है।
आत्मा सर्वव्यापी है, जैसे दूध में घी समाया रहता है। आत्मविद्या और तप जिसके मूल हैं, वही ब्रह्म है, वही उपनिषद का परम उपदेश है। वही ब्रह्म है, वही परम उपदेश।
पाठ का स्रोत: Wikisource · CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription of a public-domain text)