श्वेताश्वतरोपनिषद्

अध्याय 1: कारण क्या है? ब्रह्म का चक्र

16 श्लोक · 1 में से 6

इस अध्याय में क्या होता है

कारण क्या है? ब्रह्म का चक्र

ब्रह्मवादी पूछते हैं: कारण क्या है, ब्रह्म? हम कहाँ से उत्पन्न हुए, किससे जीते हैं, कहाँ टिके हैं? क्या काल, स्वभाव, नियति, यदृच्छा, भूत, योनि या पुरुष कारण है? इनमें से कोई अकेला नहीं। ध्यान में डूबकर उन्होंने देव की अपनी शक्ति देखी, अपने गुणों में छिपी, जो इन सब कारणों पर शासन करती है। जगत् को चक्र और पाँच धाराओं वाली नदी के रूप में दिखाया गया है। तीन हैं, भोक्ता, भोग्य और प्रेरक, और तीनों ब्रह्म हैं। जैसे लकड़ी में छिपी अग्नि मन्थन से दिखती है, वैसे ओंकार और देह के मन्थन से आत्मा दिखता है। वह हममें वैसे है जैसे दूध में घी, तिल में तेल, स्रोत में जल।

ॐ सहनाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

oṃ sahanāvavatu | saha nau bhunaktu | saha vīryaṃ karavāvahai | tejasvi nāvadhītamastu mā vidviṣāvahai ||
oṃ śāntiḥ śāntiḥ śāntiḥ ||
1.1

ॐ ब्रह्मवादिनो वदन्ति ।
किं कारणं ब्रह्म कुतः स्म जाता जीवाम केन क्व च सम्प्रतिष्ठा ।
अधिष्ठिताः केन सुखेतरेषु वर्तामहे ब्रह्मविदो व्यवस्थाम्

oṃ brahmavādino vadanti |
kiṃ kāraṇaṃ brahma kutaḥ sma jātā jīvāma kena kva ca sampratiṣṭhā |
adhiṣṭhitāḥ kena sukhetareṣu vartāmahe brahmavido vyavasthām

ब्रह्मवादी आपस में पूछते हैं: क्या ब्रह्म ही कारण है? हम कहाँ से उत्पन्न हुए? किसके बल से जीते हैं और अंत में कहाँ प्रतिष्ठित होते हैं? किसके अधीन रहकर हम सुख और दुःख में बरतते हैं? हे ब्रह्मज्ञानियो, यह व्यवस्था हमें बताइए।

1.2

कालः स्वभावो नियतिर्यदृच्छा भूतानि योनिः पुरुष इति चिन्त्यम् ।
संयोग एषां न त्वात्मभावादात्माप्यनीशः सुखदुःखहेतोः

kālaḥ svabhāvo niyatiryadṛcchā bhūtāni yoniḥ puruṣa iti cintyam |
saṃyoga eṣāṃ na tvātmabhāvādātmāpyanīśaḥ sukhaduḥkhahetoḥ

क्या काल को कारण मानें, या स्वभाव को, नियति को, संयोग को, पंचभूतों को, योनि को या पुरुष को? इनका मेल भी कारण नहीं हो सकता, क्योंकि उसे जोड़ने वाला कोई आत्मा चाहिए। और जीवात्मा भी स्वयं सुख दुःख के अधीन होने से समर्थ नहीं है।

1.3

ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन्देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम् ।
यः कारणानि निखिलानि तानि कालात्मयुक्तान्यधितिष्ठत्येकः

te dhyānayogānugatā apaśyandevātmaśaktiṃ svaguṇairnigūḍhām |
yaḥ kāraṇāni nikhilāni tāni kālātmayuktānyadhitiṣṭhatyekaḥ

ध्यानयोग में स्थित होकर उन ऋषियों ने परमदेव की अपनी शक्ति का दर्शन किया, जो अपने ही गुणों से ढकी हुई है। वही एक परमेश्वर काल से लेकर आत्मा तक उन सब कारणों का अधिष्ठाता है।

1.4

तमेकनेमिं त्रिवृतं षोडशान्तं शतार्धारं विंशतिप्रत्यराभिः ।
अष्टकैः षड्भिर्विश्वरूपैकपाशं त्रिमार्गभेदं द्विनिमित्तैकमोहम्

tamekanemiṃ trivṛtaṃ ṣoḍaśāntaṃ śatārdhāraṃ viṃśatipratyarābhiḥ |
aṣṭakaiḥ ṣaḍbhirviśvarūpaikapāśaṃ trimārgabhedaṃ dvinimittaikamoham

हम उसे एक चक्र के रूप में जानते हैं: एक नेमि, तीन गुणों का त्रिवृत घेरा, सोलह सिरे, पचास अरे और बीस प्रति अरे, आठ आठ के छह समूह, अनेक रूपों वाली एक डोरी, तीन मार्ग, और पुण्य पाप इन दो निमित्तों से उपजा एक मोह।

1.5

पञ्चस्रोतोम्बुं पञ्चयोन्युग्रवक्त्रां पञ्चप्राणोर्मिं पञ्चबुद्ध्यादिमूलाम् ।
पञ्चावर्तां पञ्चदुःखौघवेगां पञ्चाशद्भेदां पञ्चपर्वामधीमः

pañcasrotombuṃ pañcayonyugravaktrāṃ pañcaprāṇormiṃ pañcabuddhyādimūlām |
pañcāvartāṃ pañcaduḥkhaughavegāṃ pañcāśadbhedāṃ pañcaparvāmadhīmaḥ

हम उसे एक नदी के रूप में भी जानते हैं: पाँच इंद्रियाँ उसकी धाराएँ हैं, पाँच भूत उसके उग्र मोड़, पाँच प्राण उसकी लहरें, और पाँचों ज्ञानों का मूल मन उसका उद्गम है। उसमें पाँच भँवर हैं, पाँच दुःखों का वेगवान प्रवाह है, पचास भेद और पाँच पर्व हैं।

1.6

सर्वाजीवे सर्वसंस्थे बृहन्ते तस्मिन्हंसो भ्राम्यते ब्रह्मचक्रे ।
पृथगात्मानं प्रेरितारं च मत्वा जुष्टस्ततस्तेनामृतत्वमेति

sarvājīve sarvasaṃsthe bṛhante tasminhaṃso bhrāmyate brahmacakre |
pṛthagātmānaṃ preritāraṃ ca matvā juṣṭastatastenāmṛtatvameti

सबको जीवन देने वाले और सबके आश्रय इस विशाल ब्रह्मचक्र में हंस रूपी जीव भटकता रहता है, जब तक वह स्वयं को प्रेरक परमेश्वर से अलग मानता है। जब उसी की कृपा प्राप्त होती है, तब वह अमृतत्व को पाता है।

1.7

उद्गीतमेतत्परमं तु ब्रह्म तस्मिंस्त्रयं सुप्रतिष्ठाऽक्षरं च ।
अत्रान्तरं ब्रह्मविदो विदित्वा लीना ब्रह्मणि तत्परा योनिमुक्ताः

udgītametatparamaṃ tu brahma tasmiṃstrayaṃ supratiṣṭhā'kṣaraṃ ca |
atrāntaraṃ brahmavido viditvā līnā brahmaṇi tatparā yonimuktāḥ

वेदों ने इसी को परब्रह्म कहकर गाया है। इसमें भोक्ता, भोग्य और प्रेरक, ये तीनों प्रतिष्ठित हैं, और यही अविनाशी आधार है। इसके भीतर के रहस्य को जानकर ब्रह्मवेत्ता उसी में लीन और तत्पर होकर जन्म के बंधन से मुक्त हो जाते हैं।

1.8

संयुक्तमेतत्क्षरमक्षरं च व्यक्ताव्यक्तं भरते विश्वमीशः ।
अनीशश्चात्मा बध्यते भोक्तृभावाज्ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः

saṃyuktametatkṣaramakṣaraṃ ca vyaktāvyaktaṃ bharate viśvamīśaḥ |
anīśaścātmā badhyate bhoktṛbhāvājjñātvā devaṃ mucyate sarvapāśaiḥ

परमेश्वर क्षर और अक्षर, व्यक्त और अव्यक्त से मिले हुए इस सम्पूर्ण जगत का भरण करते हैं। जीवात्मा स्वयं को भोक्ता मानने के कारण असमर्थ होकर बँध जाता है। उस परमदेव को जानकर वह सब पाशों से छूट जाता है।

1.9

ज्ञाज्ञौ द्वावजावीशनीशावजा ह्येका भोक्तृभोग्यार्थयुक्ता ।
अनन्तश्चात्मा विश्वरूपो ह्यकर्ता त्रयं यदा विन्दते ब्रह्ममेतत्

jñājñau dvāvajāvīśanīśāvajā hyekā bhoktṛbhogyārthayuktā |
anantaścātmā viśvarūpo hyakartā trayaṃ yadā vindate brahmametat

दो अजन्मे हैं: एक ज्ञानी ईश्वर, दूसरा अज्ञानी जीव जो ईश्वर नहीं है। एक और अजन्मी प्रकृति है, जो भोक्ता और भोग्य से जुड़ी है। आत्मा अनंत, विश्वरूप और अकर्ता है। जब कोई इन तीनों को जान लेता है, तो यही ब्रह्म है।

1.10

क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरः क्षरात्मानावीशते देव एकः ।
तस्याभिध्यानाद्योजनात्तत्त्वभावाद्भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः

kṣaraṃ pradhānamamṛtākṣaraṃ haraḥ kṣarātmānāvīśate deva ekaḥ |
tasyābhidhyānādyojanāttattvabhāvādbhūyaścānte viśvamāyānivṛttiḥ

प्रधान अर्थात प्रकृति क्षर है, और हर अर्थात परमेश्वर अमृत और अक्षर हैं। वही एक देव क्षर प्रकृति और जीव दोनों पर शासन करते हैं। उनका ध्यान करने से, उनसे जुड़ने से और उनके भाव में स्थित होने से अंत में सारी विश्वमाया निवृत्त हो जाती है।

1.11

ज्ञात्वा देवं सर्वपाशापहानिः क्षीणैः क्लेशेर्जन्ममृत्युप्रहाणिः ।
तस्याभिध्यानात्तृतीयं देहभेदे विश्वैश्वर्यं केवल आप्तकामः

jñātvā devaṃ sarvapāśāpahāniḥ kṣīṇaiḥ kleśerjanmamṛtyuprahāṇiḥ |
tasyābhidhyānāttṛtīyaṃ dehabhede viśvaiśvaryaṃ kevala āptakāmaḥ

परमदेव को जान लेने पर सब बंधन कट जाते हैं, क्लेश क्षीण होने पर जन्म और मृत्यु का अंत हो जाता है। उनका ध्यान करने से देह छूटने पर साधक तीसरी अवस्था, विश्व के ऐश्वर्य को पाता है, और फिर केवल, पूर्णकाम होकर स्थित होता है।

1.12

एतज्ज्ञेयं नित्यमेवात्मसंस्थं नातः परं वेदितव्यं हि किञ्चित् ।
भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा सर्वं प्रोक्तं त्रिविधं ब्रह्ममेतत्

etajjñeyaṃ nityamevātmasaṃsthaṃ nātaḥ paraṃ veditavyaṃ hi kiñcit |
bhoktā bhogyaṃ preritāraṃ ca matvā sarvaṃ proktaṃ trividhaṃ brahmametat

यही जानने योग्य है, जो सदा अपने ही भीतर स्थित है। इससे परे जानने को कुछ भी नहीं। भोक्ता, भोग्य और प्रेरक को समझ लेने पर सब कुछ कह दिया गया। यही त्रिविध ब्रह्म है।

1.13

वह्नेर्यथा योनिगतस्य मूर्तिर्न दृश्यते नैव च लिङ्गनाशः ।
स भूय एवेन्धनयोनिगृह्यस्तद्वोभयं वै प्रणवेन देहे

vahneryathā yonigatasya mūrtirna dṛśyate naiva ca liṅganāśaḥ |
sa bhūya evendhanayonigṛhyastadvobhayaṃ vai praṇavena dehe

अपनी योनि अर्थात अरणि में छिपी अग्नि का रूप दिखाई नहीं देता, फिर भी उसका सूक्ष्म रूप नष्ट नहीं होता; ईंधन को मथकर वह फिर प्रकट हो जाती है। उसी प्रकार आत्मा और ब्रह्म दोनों ओंकार के द्वारा इसी देह में ग्रहण किए जाते हैं।

1.14

स्वदेहमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम् ।
ध्याननिर्मथनाभ्यासाद्देवं पश्यन्निगूढवत्

svadehamaraṇiṃ kṛtvā praṇavaṃ cottarāraṇim |
dhyānanirmathanābhyāsāddevaṃ paśyannigūḍhavat

अपने शरीर को नीचे की अरणि और प्रणव को ऊपर की अरणि बनाओ। ध्यान रूपी मंथन के निरंतर अभ्यास से भीतर छिपे हुए उस परमदेव का दर्शन करो।

1.15

तिलेषु तैलं दधिनीव सर्पिरापः स्रोतःस्वरणीषु चाग्निः ।
एवमात्माऽत्मनि गृह्यतेऽसौ सत्येनैनं तपसा योऽनुपश्यति

tileṣu tailaṃ dadhinīva sarpirāpaḥ srotaḥsvaraṇīṣu cāgniḥ |
evamātmā'tmani gṛhyate'sau satyenainaṃ tapasā yo'nupaśyati

जैसे तिल में तेल, दही में घी, सोतों में जल और अरणियों में अग्नि रहती है, वैसे ही जो साधक सत्य और तप से उसे खोजता है, वह आत्मा को अपने ही भीतर पा लेता है।

1.16

सर्वव्यापिनमात्मानं क्षीरे सर्पिरिवार्पितम् ।
आत्मविद्यातपोमूलं तद्ब्रह्मोपनिषत्परं तद्ब्रह्मोपनिषत्परमिति

sarvavyāpinamātmānaṃ kṣīre sarpirivārpitam |
ātmavidyātapomūlaṃ tadbrahmopaniṣatparaṃ tadbrahmopaniṣatparamiti

आत्मा सर्वव्यापी है, जैसे दूध में घी समाया रहता है। आत्मविद्या और तप जिसके मूल हैं, वही ब्रह्म है, वही उपनिषद का परम उपदेश है। वही ब्रह्म है, वही परम उपदेश।

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