अ॒या सोम॑ः सुकृ॒त्यया॑ म॒हश्चि॑द॒भ्य॑वर्धत ।
म॒न्दा॒न उद्वृ॑षायते
ayā somaḥ sukṛtyayā mahaścidabhyavardhata |
mandāna udvṛṣāyate
ऋषि: कविर्भार्गवः · देवता: पवमानः सोमः · छन्द: गायत्री
5 श्लोक · 47 में से 114
कवि भार्गव पाँच गायत्री मन्त्रों में गाते हैं। यज्ञ के इस सुकृत्य से सोम महान हुए हैं, और हर्षित होकर वृषभ की भाँति आचरण करते हैं। दस्युओं का नाश करने वाले उनके कर्म प्रसिद्ध हैं, और वे साहस से ऋण वसूलते हैं। जब उनका स्तोत्र जन्म लेता है, तब इन्द्र के योग्य रस सहस्र जीतने वाला वज्र बन जाता है। बुद्धियों द्वारा मार्जित होते समय स्वयं कवि सोम विप्र के लिए रत्न चाहते हैं। अन्तिम मन्त्र प्रार्थना करता है कि धन जीतने के इच्छुक सोम संग्रामों में अश्वों की भाँति हमारी सहायता करें और हम युद्धों में विजयी हों।
अ॒या सोम॑ः सुकृ॒त्यया॑ म॒हश्चि॑द॒भ्य॑वर्धत ।
म॒न्दा॒न उद्वृ॑षायते
ayā somaḥ sukṛtyayā mahaścidabhyavardhata |
mandāna udvṛṣāyate
कृ॒तानीद॑स्य॒ कर्त्वा॒ चेत॑न्ते दस्यु॒तर्ह॑णा ।
ऋ॒णा च॑ धृ॒ष्णुश्च॑यते
kṛtānīdasya kartvā cetante dasyutarhaṇā |
ṛṇā ca dhṛṣṇuścayate
आत्सोम॑ इन्द्रि॒यो रसो॒ वज्र॑ः सहस्र॒सा भु॑वत् ।
उ॒क्थं यद॑स्य॒ जाय॑ते
ātsoma indriyo raso vajraḥ sahasrasā bhuvat |
ukthaṃ yadasya jāyate
स्व॒यं क॒विर्वि॑ध॒र्तरि॒ विप्रा॑य॒ रत्न॑मिच्छति ।
यदी॑ मर्मृ॒ज्यते॒ धिय॑ः
svayaṃ kavirvidhartari viprāya ratnamicchati |
yadī marmṛjyate dhiyaḥ
सि॒षा॒सतू॑ रयी॒णां वाजे॒ष्वर्व॑तामिव ।
भरे॑षु जि॒ग्युषा॑मसि
siṣāsatū rayīṇāṃ vājeṣvarvatāmiva |
bhareṣu jigyuṣāmasi
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