नवम मण्डल

सूक्त 46: पर्वत पर पले सोम-बिन्दु

ऋषि: अयास्य आङ्गिरसः · देवता: पवमानः सोमः · छन्द: गायत्री

6 श्लोक · 46 में से 114

इस अध्याय में क्या होता है

पर्वत पर पले सोम-बिन्दु

अयास्य आङ्गिरस का तीसरा गायत्री सूक्त। पर्वत पर बलवान हुए सोम-बिन्दु कुशल अश्वों की भाँति देवों के भोज के लिए छोड़े जाते हैं। पिता का दहेज लिए कन्या की भाँति सजकर वे वायु के पास भेजे जाते हैं। चमसों में निचोड़े, अन्न से भरे वे अपने कर्मों से इन्द्र को बढ़ाते हैं। ऋषि कुशल हाथों वाले ऋत्विजों को पुकारते हैं: दौड़कर आओ, मन्थन के मिश्रण से दीप्त बूँदों को लो और हर्ष देने वाले रस को दूध से मिलाओ। धन जीतने वाले, मार्ग के ज्ञाता सोम से महान दान माँगा जाता है। दस अँगुलियाँ पवमान को सँवारती हैं, जो इन्द्र के लिए आनन्द है।

46.1

असृ॑ग्रन्दे॒ववी॑त॒येऽत्या॑स॒ः कृत्व्या॑ इव ।
क्षर॑न्तः पर्वता॒वृध॑ः

asṛgrandevavītaye'tyāsaḥ kṛtvyā iva |
kṣarantaḥ parvatāvṛdhaḥ

46.2

परि॑ष्कृतास॒ इन्द॑वो॒ योषे॑व॒ पित्र्या॑वती ।
वा॒युं सोमा॑ असृक्षत

pariṣkṛtāsa indavo yoṣeva pitryāvatī |
vāyuṃ somā asṛkṣata

46.3

ए॒ते सोमा॑स॒ इन्द॑व॒ः प्रय॑स्वन्तश्च॒मू सु॒ताः ।
इन्द्रं॑ वर्धन्ति॒ कर्म॑भिः

ete somāsa indavaḥ prayasvantaścamū sutāḥ |
indraṃ vardhanti karmabhiḥ

46.4

आ धा॑वता सुहस्त्यः शु॒क्रा गृ॑भ्णीत म॒न्थिना॑ ।
गोभि॑ः श्रीणीत मत्स॒रम्

ā dhāvatā suhastyaḥ śukrā gṛbhṇīta manthinā |
gobhiḥ śrīṇīta matsaram

46.5

स प॑वस्व धनंजय प्रय॒न्ता राध॑सो म॒हः ।
अ॒स्मभ्यं॑ सोम गातु॒वित्

sa pavasva dhanaṃjaya prayantā rādhaso mahaḥ |
asmabhyaṃ soma gātuvit

46.6

ए॒तं मृ॑जन्ति॒ मर्ज्यं॒ पव॑मानं॒ दश॒ क्षिप॑ः ।
इन्द्रा॑य मत्स॒रं मद॑म्

etaṃ mṛjanti marjyaṃ pavamānaṃ daśa kṣipaḥ |
indrāya matsaraṃ madam

पाठ का स्रोत: Wikisource · CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription of a public-domain text)