अष्टम मण्डल

सूक्त 15: द्यावापृथिवी इन्द्र का यश बढ़ाते हैं

ऋषि: गोषूक्त्यश्वसूक्तिनौ काण्वायनौ · देवता: इन्द्रः · छन्द: उष्णिक्

13 श्लोक · 15 में से 103

इस अध्याय में क्या होता है

द्यावापृथिवी इन्द्र का यश बढ़ाते हैं

वही दोनों ऋषि, गोषूक्ति और अश्वसूक्ति, जनों को पुकारते हैं कि अनेकों से पुकारे गए इन्द्र का गान करें। उनका बल द्युलोक और पृथ्वी को, पर्वतों, मैदानों और जलों को धारण करता है। अकेले वे ही वृत्रों को मारते हैं। उनका मद युद्ध में वृषभ है, खुला स्थान बनाने वाला, और उसी से उन्होंने आयु और मनु को ज्योति दिखाई। द्युलोक उनका पौरुष बढ़ाता है, पृथ्वी उनका यश; जल और पर्वत उन्हें प्रेरित करते हैं। विशाल धाम वाले विष्णु, मित्र और वरुण उनकी स्तुति करते हैं और मरुतों का दल उनके साथ आनन्दित है। इन्द्र से बढ़कर कोई और कुछ नहीं करता। उन्हें विजय के लिए हर्षित किया जाए।

15.1

तम्व॒भि प्र गा॑यत पुरुहू॒तं पु॑रुष्टु॒तम् ।
इन्द्रं॑ गी॒र्भिस्त॑वि॒षमा वि॑वासत

tamvabhi pra gāyata puruhūtaṃ puruṣṭutam |
indraṃ gīrbhistaviṣamā vivāsata

15.2

यस्य॑ द्वि॒बर्ह॑सो बृ॒हत्सहो॑ दा॒धार॒ रोद॑सी ।
गि॒रीँरज्राँ॑ अ॒पः स्व॑र्वृषत्व॒ना

yasya dvibarhaso bṛhatsaho dādhāra rodasī |
girīm̐rajrām̐ apaḥ svarvṛṣatvanā

15.3

स रा॑जसि पुरुष्टुतँ॒ एको॑ वृ॒त्राणि॑ जिघ्नसे ।
इन्द्र॒ जैत्रा॑ श्रव॒स्या॑ च॒ यन्त॑वे

sa rājasi puruṣṭutam̐ eko vṛtrāṇi jighnase |
indra jaitrā śravasyā ca yantave

15.4

तं ते॒ मदं॑ गृणीमसि॒ वृष॑णं पृ॒त्सु सा॑स॒हिम् ।
उ॒ लो॒क॒कृ॒त्नुम॑द्रिवो हरि॒श्रिय॑म्

taṃ te madaṃ gṛṇīmasi vṛṣaṇaṃ pṛtsu sāsahim |
u lokakṛtnumadrivo hariśriyam

15.5

येन॒ ज्योतीं॑ष्या॒यवे॒ मन॑वे च वि॒वेदि॑थ ।
म॒न्दा॒नो अ॒स्य ब॒र्हिषो॒ वि रा॑जसि

yena jyotīṃṣyāyave manave ca viveditha |
mandāno asya barhiṣo vi rājasi

15.6

तद॒द्या चि॑त्त उ॒क्थिनोऽनु॑ ष्टुवन्ति पू॒र्वथा॑ ।
वृष॑पत्नीर॒पो ज॑या दि॒वेदि॑वे

tadadyā citta ukthino'nu ṣṭuvanti pūrvathā |
vṛṣapatnīrapo jayā divedive

15.7

तव॒ त्यदि॑न्द्रि॒यं बृ॒हत्तव॒ शुष्म॑मु॒त क्रतु॑म् ।
वज्रं॑ शिशाति धि॒षणा॒ वरे॑ण्यम्

tava tyadindriyaṃ bṛhattava śuṣmamuta kratum |
vajraṃ śiśāti dhiṣaṇā vareṇyam

15.8

तव॒ द्यौरि॑न्द्र॒ पौंस्यं॑ पृथि॒वी व॑र्धति॒ श्रव॑ः ।
त्वामाप॒ः पर्व॑तासश्च हिन्विरे

tava dyaurindra pauṃsyaṃ pṛthivī vardhati śravaḥ |
tvāmāpaḥ parvatāsaśca hinvire

15.9

त्वां विष्णु॑र्बृ॒हन्क्षयो॑ मि॒त्रो गृ॑णाति॒ वरु॑णः ।
त्वां शर्धो॑ मद॒त्यनु॒ मारु॑तम्

tvāṃ viṣṇurbṛhankṣayo mitro gṛṇāti varuṇaḥ |
tvāṃ śardho madatyanu mārutam

15.10

त्वं वृषा॒ जना॑नां॒ मंहि॑ष्ठ इन्द्र जज्ञिषे ।
स॒त्रा विश्वा॑ स्वप॒त्यानि॑ दधिषे

tvaṃ vṛṣā janānāṃ maṃhiṣṭha indra jajñiṣe |
satrā viśvā svapatyāni dadhiṣe

15.11

स॒त्रा त्वं पु॑रुष्टुतँ॒ एको॑ वृ॒त्राणि॑ तोशसे ।
नान्य इन्द्रा॒त्कर॑णं॒ भूय॑ इन्वति

satrā tvaṃ puruṣṭutam̐ eko vṛtrāṇi tośase |
nānya indrātkaraṇaṃ bhūya invati

15.12

यदि॑न्द्र मन्म॒शस्त्वा॒ नाना॒ हव॑न्त ऊ॒तये॑ ।
अ॒स्माके॑भि॒र्नृभि॒रत्रा॒ स्व॑र्जय

yadindra manmaśastvā nānā havanta ūtaye |
asmākebhirnṛbhiratrā svarjaya

15.13

अरं॒ क्षया॑य नो म॒हे विश्वा॑ रू॒पाण्या॑वि॒शन् ।
इन्द्रं॒ जैत्रा॑य हर्षया॒ शची॒पति॑म्

araṃ kṣayāya no mahe viśvā rūpāṇyāviśan |
indraṃ jaitrāya harṣayā śacīpatim

पाठ का स्रोत: Wikisource · CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription of a public-domain text)