सप्तम मण्डल

सूक्त 87: वरुण सूर्य के लिए मार्ग बनाते हैं

ऋषि: मैत्रावरुणिर्वसिष्ठः · देवता: वरुणः · छन्द: त्रिष्टुप्

7 श्लोक · 87 में से 104

इस अध्याय में क्या होता है

वरुण सूर्य के लिए मार्ग बनाते हैं

महर्षि वसिष्ठ कहते हैं कि वरुण ने सूर्य के लिए मार्ग बनाये और नदियों की बाढ़ को समुद्र तक भेजा। वायु उनका प्राण है, द्युलोक और पृथ्वी और उनके सब धाम उन्हें प्रिय हैं। उनके भेजे गुप्तचर दोनों लोकों को देखते हैं। ऋषि कहते हैं, वरुण ने मुझसे कहा कि अघ्न्या गौ इक्कीस नाम धारण करती है, और गुप्त पद का ज्ञाता यह ज्ञान आगे की पीढ़ी को सिखाएगा। तीन द्युलोक और तीन भूमियाँ उनके भीतर स्थित हैं। ज्ञानी राजा वरुण ने आकाश में स्वर्ण का झूला चमकने को बनाया। जो पाप करने वाले पर भी दया करते हैं, उन वरुण के सामने हम निष्पाप हों।

87.1

रद॑त्प॒थो वरु॑ण॒ः सूर्या॑य॒ प्रार्णां॑सि समु॒द्रिया॑ न॒दीना॑म् ।
सर्गो॒ न सृ॒ष्टो अर्व॑तीरृता॒यञ्च॒कार॑ म॒हीर॒वनी॒रह॑भ्यः

radatpatho varuṇaḥ sūryāya prārṇāṃsi samudriyā nadīnām |
sargo na sṛṣṭo arvatīrṛtāyañcakāra mahīravanīrahabhyaḥ

87.2

आ॒त्मा ते॒ वातो॒ रज॒ आ न॑वीनोत्प॒शुर्न भूर्णि॒र्यव॑से सस॒वान् ।
अ॒न्तर्म॒ही बृ॑ह॒ती रोद॑सी॒मे विश्वा॑ ते॒ धाम॑ वरुण प्रि॒याणि॑

ātmā te vāto raja ā navīnotpaśurna bhūrṇiryavase sasavān |
antarmahī bṛhatī rodasīme viśvā te dhāma varuṇa priyāṇi

87.3

परि॒ स्पशो॒ वरु॑णस्य॒ स्मदि॑ष्टा उ॒भे प॑श्यन्ति॒ रोद॑सी सु॒मेके॑ ।
ऋ॒तावा॑नः क॒वयो॑ य॒ज्ञधी॑रा॒ः प्रचे॑तसो॒ य इ॒षय॑न्त॒ मन्म॑

pari spaśo varuṇasya smadiṣṭā ubhe paśyanti rodasī sumeke |
ṛtāvānaḥ kavayo yajñadhīrāḥ pracetaso ya iṣayanta manma

87.4

उ॒वाच॑ मे॒ वरु॑णो॒ मेधि॑राय॒ त्रिः स॒प्त नामाघ्न्या॑ बिभर्ति ।
वि॒द्वान्प॒दस्य॒ गुह्या॒ न वो॑चद्यु॒गाय॒ विप्र॒ उप॑राय॒ शिक्ष॑न्

uvāca me varuṇo medhirāya triḥ sapta nāmāghnyā bibharti |
vidvānpadasya guhyā na vocadyugāya vipra uparāya śikṣan

87.5

ति॒स्रो द्यावो॒ निहि॑ता अ॒न्तर॑स्मिन्ति॒स्रो भूमी॒रुप॑रा॒ः षड्वि॑धानाः ।
गृत्सो॒ राजा॒ वरु॑णश्चक्र ए॒तं दि॒वि प्रे॒ङ्खं हि॑र॒ण्ययं॑ शु॒भे कम्

tisro dyāvo nihitā antarasmintisro bhūmīruparāḥ ṣaḍvidhānāḥ |
gṛtso rājā varuṇaścakra etaṃ divi preṅkhaṃ hiraṇyayaṃ śubhe kam

87.6

अव॒ सिन्धुं॒ वरु॑णो॒ द्यौरि॑व स्थाद्द्र॒प्सो न श्वे॒तो मृ॒गस्तुवि॑ष्मान् ।
ग॒म्भी॒रशं॑सो॒ रज॑सो वि॒मान॑ः सुपा॒रक्ष॑त्रः स॒तो अ॒स्य राजा॑

ava sindhuṃ varuṇo dyauriva sthāddrapso na śveto mṛgastuviṣmān |
gambhīraśaṃso rajaso vimānaḥ supārakṣatraḥ sato asya rājā

87.7

यो मृ॒ळया॑ति च॒क्रुषे॑ चि॒दागो॑ व॒यं स्या॑म॒ वरु॑णे॒ अना॑गाः ।
अनु॑ व्र॒तान्यदि॑तेरृ॒धन्तो॑ यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभि॒ः सदा॑ नः

yo mṛḻayāti cakruṣe cidāgo vayaṃ syāma varuṇe anāgāḥ |
anu vratānyaditerṛdhanto yūyaṃ pāta svastibhiḥ sadā naḥ

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