सप्तम मण्डल

सूक्त 72: अश्विनौ, हर दिशा से आओ

ऋषि: मैत्रावरुणिर्वसिष्ठः · देवता: अश्विनौ · छन्द: त्रिष्टुप्

5 श्लोक · 72 में से 104

इस अध्याय में क्या होता है

अश्विनौ, हर दिशा से आओ

महर्षि वसिष्ठ नासत्यों से कहते हैं कि गौओं और घोड़ों से भरे रथ पर अन्य देवों के साथ आओ, क्योंकि हमारे पितरों से तुम्हारी पुरानी मैत्री है और एक ही बन्धुता है। स्तोत्र जाग उठे हैं, उषाएँ जाग उठी हैं, और स्तोता अश्विनौ का अभिवादन करता है। उषाओं के चमकने पर सविता देव अपना प्रकाश ऊँचा उठाते हैं और समिधा पाकर अग्नियाँ गान करती हैं। पाँच त्रिष्टुप् मन्त्रों में ऋषि उन्हें पश्चिम और पूर्व से, नीचे और ऊपर से, पाँचों जनों के धन के साथ बुलाते हैं।

72.1

आ गोम॑ता नासत्या॒ रथे॒नाश्वा॑वता पुरुश्च॒न्द्रेण॑ यातम् ।
अ॒भि वां॒ विश्वा॑ नि॒युत॑ः सचन्ते स्पा॒र्हया॑ श्रि॒या त॒न्वा॑ शुभा॒ना

ā gomatā nāsatyā rathenāśvāvatā puruścandreṇa yātam |
abhi vāṃ viśvā niyutaḥ sacante spārhayā śriyā tanvā śubhānā

72.2

आ नो॑ दे॒वेभि॒रुप॑ यातम॒र्वाक्स॒जोष॑सा नासत्या॒ रथे॑न ।
यु॒वोर्हि न॑ः स॒ख्या पित्र्या॑णि समा॒नो बन्धु॑रु॒त तस्य॑ वित्तम्

ā no devebhirupa yātamarvāksajoṣasā nāsatyā rathena |
yuvorhi naḥ sakhyā pitryāṇi samāno bandhuruta tasya vittam

72.3

उदु॒ स्तोमा॑सो अ॒श्विनो॑रबुध्रञ्जा॒मि ब्रह्मा॑ण्यु॒षस॑श्च दे॒वीः ।
आ॒विवा॑स॒न्रोद॑सी॒ धिष्ण्ये॒मे अच्छा॒ विप्रो॒ नास॑त्या विवक्ति

udu stomāso aśvinorabudhrañjāmi brahmāṇyuṣasaśca devīḥ |
āvivāsanrodasī dhiṣṇyeme acchā vipro nāsatyā vivakti

72.4

वि चेदु॒च्छन्त्य॑श्विना उ॒षास॒ः प्र वां॒ ब्रह्मा॑णि का॒रवो॑ भरन्ते ।
ऊ॒र्ध्वं भा॒नुं स॑वि॒ता दे॒वो अ॑श्रेद्बृ॒हद॒ग्नय॑ः स॒मिधा॑ जरन्ते

vi ceducchantyaśvinā uṣāsaḥ pra vāṃ brahmāṇi kāravo bharante |
ūrdhvaṃ bhānuṃ savitā devo aśredbṛhadagnayaḥ samidhā jarante

72.5

आ प॒श्चाता॑न्नास॒त्या पु॒रस्ता॒दाश्वि॑ना यातमध॒रादुद॑क्तात् ।
आ वि॒श्वत॒ः पाञ्च॑जन्येन रा॒या यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभि॒ः सदा॑ नः

ā paścātānnāsatyā purastādāśvinā yātamadharādudaktāt |
ā viśvataḥ pāñcajanyena rāyā yūyaṃ pāta svastibhiḥ sadā naḥ

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