सप्तम मण्डल

सूक्त 63: सूर्य, मित्रावरुण का नेत्र

ऋषि: मैत्रावरुणिर्वसिष्ठः · देवता: १-४ सूर्यः, ५ सूर्य-मित्रावरुणाः, ६ मित्रावरुणौ अर्यमा च · छन्द: त्रिष्टुप्

6 श्लोक · 63 में से 104

इस अध्याय में क्या होता है

सूर्य, मित्रावरुण का नेत्र

सौभाग्यशाली, सबको देखने वाला, सब मनुष्यों का समान रूप से अपना सूर्य उदय होता है, मित्र और वरुण का नेत्र, जो अन्धकार को चमड़े की भाँति लपेट लेता है। महर्षि वसिष्ठ उसे प्रजा को जगाने वाला, महान् ध्वज, और एतश घोड़े से खींचे एक ही चक्र को घुमाने वाला देखते हैं। उषाओं की गोद से चमकता हुआ वह स्तोताओं के उल्लास के साथ उठता है, इस सविता ने सनातन नियम नहीं तोड़ा। द्युलोक का यह स्वर्ण-आभूषण दूर तक जाता है और उससे प्रेरित मनुष्य अपने कामों में लगते हैं। अन्त में ऋषि सूर्योदय पर मित्र, वरुण और अर्यमा को नमन करते हैं।

63.1

उद्वे॑ति सु॒भगो॑ वि॒श्वच॑क्षा॒ः साधा॑रण॒ः सूर्यो॒ मानु॑षाणाम् ।
चक्षु॑र्मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्य दे॒वश्चर्मे॑व॒ यः स॒मवि॑व्य॒क्तमां॑सि

udveti subhago viśvacakṣāḥ sādhāraṇaḥ sūryo mānuṣāṇām |
cakṣurmitrasya varuṇasya devaścarmeva yaḥ samavivyaktamāṃsi

63.2

उद्वे॑ति प्रसवी॒ता जना॑नां म॒हान्के॒तुर॑र्ण॒वः सूर्य॑स्य ।
स॒मा॒नं च॒क्रं प॑र्या॒विवृ॑त्स॒न्यदे॑त॒शो वह॑ति धू॒र्षु यु॒क्तः

udveti prasavītā janānāṃ mahānketurarṇavaḥ sūryasya |
samānaṃ cakraṃ paryāvivṛtsanyadetaśo vahati dhūrṣu yuktaḥ

63.3

वि॒भ्राज॑मान उ॒षसा॑मु॒पस्था॑द्रे॒भैरुदे॑त्यनुम॒द्यमा॑नः ।
ए॒ष मे॑ दे॒वः स॑वि॒ता च॑च्छन्द॒ यः स॑मा॒नं न प्र॑मि॒नाति॒ धाम॑

vibhrājamāna uṣasāmupasthādrebhairudetyanumadyamānaḥ |
eṣa me devaḥ savitā cacchanda yaḥ samānaṃ na pramināti dhāma

63.4

दि॒वो रु॒क्म उ॑रु॒चक्षा॒ उदे॑ति दू॒रेअ॑र्थस्त॒रणि॒र्भ्राज॑मानः ।
नू॒नं जना॒ः सूर्ये॑ण॒ प्रसू॑ता॒ अय॒न्नर्था॑नि कृ॒णव॒न्नपां॑सि

divo rukma urucakṣā udeti dūrearthastaraṇirbhrājamānaḥ |
nūnaṃ janāḥ sūryeṇa prasūtā ayannarthāni kṛṇavannapāṃsi

63.5

यत्रा॑ च॒क्रुर॒मृता॑ गा॒तुम॑स्मै श्ये॒नो न दीय॒न्नन्वे॑ति॒ पाथ॑ः ।
प्रति॑ वां॒ सूर॒ उदि॑ते विधेम॒ नमो॑भिर्मित्रावरुणो॒त ह॒व्यैः

yatrā cakruramṛtā gātumasmai śyeno na dīyannanveti pāthaḥ |
prati vāṃ sūra udite vidhema namobhirmitrāvaruṇota havyaiḥ

63.6

नू मि॒त्रो वरु॑णो अर्य॒मा न॒स्त्मने॑ तो॒काय॒ वरि॑वो दधन्तु ।
सु॒गा नो॒ विश्वा॑ सु॒पथा॑नि सन्तु यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभि॒ः सदा॑ नः

nū mitro varuṇo aryamā nastmane tokāya varivo dadhantu |
sugā no viśvā supathāni santu yūyaṃ pāta svastibhiḥ sadā naḥ

पाठ का स्रोत: Wikisource · CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription of a public-domain text)