सप्तम मण्डल

सूक्त 62: सूर्य का उदय, मित्रावरुण का आशीर्वाद

ऋषि: मैत्रावरुणिर्वसिष्ठः · देवता: १-३ सूर्यः, ४-६ मित्रावरुणौ · छन्द: त्रिष्टुप्

6 श्लोक · 62 में से 104

इस अध्याय में क्या होता है

सूर्य का उदय, मित्रावरुण का आशीर्वाद

महर्षि वसिष्ठ बड़ी ज्वालाओं के साथ सब मनुष्यों के ऊपर चढ़ते सूर्य का गान करते हैं। सूर्य मित्र, वरुण, अर्यमा और अग्नि से कहें कि हम निष्पाप हैं। चौथे से छठे मन्त्र तक वे द्युलोक, पृथ्वी और अदिति सहित मित्र और वरुण से प्रार्थना करते हैं: हम वरुण, वायु या मित्र के कोप में न पड़ें। हमारे जीवन के लिए अपनी भुजाएँ फैलाओ, हमारे चरागाहों को घी से सींचो, और जनों में हमारा यश सुनाओ। हमारे सब मार्ग सुगम हों।

62.1

उत्सूर्यो॑ बृ॒हद॒र्चींष्य॑श्रेत्पु॒रु विश्वा॒ जनि॑म॒ मानु॑षाणाम् ।
स॒मो दि॒वा द॑दृशे॒ रोच॑मान॒ः क्रत्वा॑ कृ॒तः सुकृ॑तः क॒र्तृभि॑र्भूत्

utsūryo bṛhadarcīṃṣyaśretpuru viśvā janima mānuṣāṇām |
samo divā dadṛśe rocamānaḥ kratvā kṛtaḥ sukṛtaḥ kartṛbhirbhūt

62.2

स सू॑र्य॒ प्रति॑ पु॒रो न॒ उद्गा॑ ए॒भिः स्तोमे॑भिरेत॒शेभि॒रेवै॑ः ।
प्र नो॑ मि॒त्राय॒ वरु॑णाय वो॒चोऽना॑गसो अर्य॒म्णे अ॒ग्नये॑ च

sa sūrya prati puro na udgā ebhiḥ stomebhiretaśebhirevaiḥ |
pra no mitrāya varuṇāya voco'nāgaso aryamṇe agnaye ca

62.3

वि न॑ः स॒हस्रं॑ शु॒रुधो॑ रदन्त्वृ॒तावा॑नो॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॒ग्निः ।
यच्छ॑न्तु च॒न्द्रा उ॑प॒मं नो॑ अ॒र्कमा न॒ः कामं॑ पूपुरन्तु॒ स्तवा॑नाः

vi naḥ sahasraṃ śurudho radantvṛtāvāno varuṇo mitro agniḥ |
yacchantu candrā upamaṃ no arkamā naḥ kāmaṃ pūpurantu stavānāḥ

62.4

द्यावा॑भूमी अदिते॒ त्रासी॑थां नो॒ ये वां॑ ज॒ज्ञुः सु॒जनि॑मान ऋष्वे ।
मा हेळे॑ भूम॒ वरु॑णस्य वा॒योर्मा मि॒त्रस्य॑ प्रि॒यत॑मस्य नृ॒णाम्

dyāvābhūmī adite trāsīthāṃ no ye vāṃ jajñuḥ sujanimāna ṛṣve |
mā heḻe bhūma varuṇasya vāyormā mitrasya priyatamasya nṛṇām

62.5

प्र बा॒हवा॑ सिसृतं जी॒वसे॑ न॒ आ नो॒ गव्यू॑तिमुक्षतं घृ॒तेन॑ ।
आ नो॒ जने॑ श्रवयतं युवाना श्रु॒तं मे॑ मित्रावरुणा॒ हवे॒मा

pra bāhavā sisṛtaṃ jīvase na ā no gavyūtimukṣataṃ ghṛtena |
ā no jane śravayataṃ yuvānā śrutaṃ me mitrāvaruṇā havemā

62.6

नू मि॒त्रो वरु॑णो अर्य॒मा न॒स्त्मने॑ तो॒काय॒ वरि॑वो दधन्तु ।
सु॒गा नो॒ विश्वा॑ सु॒पथा॑नि सन्तु यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभि॒ः सदा॑ नः

nū mitro varuṇo aryamā nastmane tokāya varivo dadhantu |
sugā no viśvā supathāni santu yūyaṃ pāta svastibhiḥ sadā naḥ

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