सप्तम मण्डल

सूक्त 55: वास्तोष्पति और निद्रा के मन्त्र

ऋषि: मैत्रावरुणिर्वसिष्ठः · देवता: वास्तोष्पतिः, २-८ इन्द्रः ( २-८ प्रस्वापिनी उपनिषद्) · छन्द: गायत्री, २-४ उपरिष्टाद्बृहती, ५-८ अनुष्टुप्

8 श्लोक · 55 में से 104

इस अध्याय में क्या होता है

वास्तोष्पति और निद्रा के मन्त्र

महर्षि वसिष्ठ पहले मन्त्र में वास्तोष्पति की स्तुति करते हैं, जो रोग का नाश करते हैं और सब रूपों में प्रविष्ट हैं। आगे के सात मन्त्र, जिनके देवता अनुक्रमणी में इन्द्र हैं और जिन्हें प्रस्वापिनी उपनिषद् कहा गया है, घर के कुत्ते से कहे गये हैं। सरमा का यह पिंगल पुत्र, जिसके दाँत भालों की नोक-से चमकते हैं, चोर पर भौंके, इन्द्र के स्तोताओं पर नहीं, और सो जाए। फिर मन्त्र सबको सुलाता है: माता सोए, पिता सोए, कुत्ता और गृहपति सोएँ, सारे सम्बन्धी सोएँ। समुद्र से उठे सहस्र सींगों वाले वृषभ के बल से कवि सबको, शय्या पर लेटी स्त्रियों तक को, निद्रा में डाल देता है।

55.1

अ॒मी॒व॒हा वा॑स्तोष्पते॒ विश्वा॑ रू॒पाण्या॑वि॒शन् ।
सखा॑ सु॒शेव॑ एधि नः

amīvahā vāstoṣpate viśvā rūpāṇyāviśan |
sakhā suśeva edhi naḥ

55.2

यद॑र्जुन सारमेय द॒तः पि॑शङ्ग॒ यच्छ॑से ।
वी॑व भ्राजन्त ऋ॒ष्टय॒ उप॒ स्रक्वे॑षु॒ बप्स॑तो॒ नि षु स्व॑प

yadarjuna sārameya dataḥ piśaṅga yacchase |
vīva bhrājanta ṛṣṭaya upa srakveṣu bapsato ni ṣu svapa

55.3

स्ते॒नं रा॑य सारमेय॒ तस्क॑रं वा पुनःसर ।
स्तो॒तॄनिन्द्र॑स्य रायसि॒ किम॒स्मान्दु॑च्छुनायसे॒ नि षु स्व॑प

stenaṃ rāya sārameya taskaraṃ vā punaḥsara |
stotṝnindrasya rāyasi kimasmānducchunāyase ni ṣu svapa

55.4

त्वं सू॑क॒रस्य॑ दर्दृहि॒ तव॑ दर्दर्तु सूक॒रः ।
स्तो॒तॄनिन्द्र॑स्य रायसि॒ किम॒स्मान्दु॑च्छुनायसे॒ नि षु स्व॑प

tvaṃ sūkarasya dardṛhi tava dardartu sūkaraḥ |
stotṝnindrasya rāyasi kimasmānducchunāyase ni ṣu svapa

55.5

सस्तु॑ मा॒ता सस्तु॑ पि॒ता सस्तु॒ श्वा सस्तु॑ वि॒श्पति॑ः ।
स॒सन्तु॒ सर्वे॑ ज्ञा॒तय॒ः सस्त्व॒यम॒भितो॒ जन॑ः

sastu mātā sastu pitā sastu śvā sastu viśpatiḥ |
sasantu sarve jñātayaḥ sastvayamabhito janaḥ

55.6

य आस्ते॒ यश्च॒ चर॑ति॒ यश्च॒ पश्य॑ति नो॒ जन॑ः ।
तेषां॒ सं ह॑न्मो अ॒क्षाणि॒ यथे॒दं ह॒र्म्यं तथा॑

ya āste yaśca carati yaśca paśyati no janaḥ |
teṣāṃ saṃ hanmo akṣāṇi yathedaṃ harmyaṃ tathā

55.7

स॒हस्र॑शृङ्गो वृष॒भो यः स॑मु॒द्रादु॒दाच॑रत् ।
तेना॑ सह॒स्ये॑ना व॒यं नि जना॑न्स्वापयामसि

sahasraśṛṅgo vṛṣabho yaḥ samudrādudācarat |
tenā sahasyenā vayaṃ ni janānsvāpayāmasi

55.8

प्रो॒ष्ठे॒श॒या व॑ह्येश॒या नारी॒र्यास्त॑ल्प॒शीव॑रीः ।
स्त्रियो॒ याः पुण्य॑गन्धा॒स्ताः सर्वा॑ः स्वापयामसि

proṣṭheśayā vahyeśayā nārīryāstalpaśīvarīḥ |
striyo yāḥ puṇyagandhāstāḥ sarvāḥ svāpayāmasi

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