षष्ठ मण्डल

सूक्त 40: हरि घोड़ों को खोलो, इन्द्र, सोम पियो

ऋषि: बार्हस्पत्यो भरद्वाजः · देवता: इन्द्रः · छन्द: त्रिष्टुप्

5 श्लोक · 40 में से 75

इस अध्याय में क्या होता है

हरि घोड़ों को खोलो, इन्द्र, सोम पियो

बार्हस्पत्य भरद्वाज का त्रिष्टुप् में इन्द्र को छोटा-सा निमन्त्रण। सोम उनके आनन्द के लिए निचोड़ा गया है; वे अपने दोनों मित्र हरि घोड़ों को खोलें, गायकों के बीच बैठें और यजमान को बल दें। यह वही पेय है जिसे उन्होंने जन्म लेते ही पिया था; गायों, मनुष्यों, जलों और पत्थरों ने इसे तैयार किया है। अग्नि प्रज्वलित है, और कवि उत्सुक मन से उन्हें बार-बार पुकारता है। वे दूर स्वर्ग में हों या अपने धाम में, नियुत् घोड़ों और मरुतों के साथ आकर यज्ञ की रक्षा करें।

40.1

इन्द्र॒ पिब॒ तुभ्यं॑ सु॒तो मदा॒याव॑ स्य॒ हरी॒ वि मु॑चा॒ सखा॑या ।
उ॒त प्र गा॑य ग॒ण आ नि॒षद्याथा॑ य॒ज्ञाय॑ गृण॒ते वयो॑ धाः

indra piba tubhyaṃ suto madāyāva sya harī vi mucā sakhāyā |
uta pra gāya gaṇa ā niṣadyāthā yajñāya gṛṇate vayo dhāḥ

40.2

अस्य॑ पिब॒ यस्य॑ जज्ञा॒न इ॑न्द्र॒ मदा॑य॒ क्रत्वे॒ अपि॑बो विरप्शिन् ।
तमु॑ ते॒ गावो॒ नर॒ आपो॒ अद्रि॒रिन्दुं॒ सम॑ह्यन्पी॒तये॒ सम॑स्मै

asya piba yasya jajñāna indra madāya kratve apibo virapśin |
tamu te gāvo nara āpo adririnduṃ samahyanpītaye samasmai

40.3

समि॑द्धे अ॒ग्नौ सु॒त इ॑न्द्र॒ सोम॒ आ त्वा॑ वहन्तु॒ हर॑यो॒ वहि॑ष्ठाः ।
त्वा॒य॒ता मन॑सा जोहवी॒मीन्द्रा या॑हि सुवि॒ताय॑ म॒हे न॑ः

samiddhe agnau suta indra soma ā tvā vahantu harayo vahiṣṭhāḥ |
tvāyatā manasā johavīmīndrā yāhi suvitāya mahe naḥ

40.4

आ या॑हि॒ शश्व॑दुश॒ता य॑या॒थेन्द्र॑ म॒हा मन॑सा सोम॒पेय॑म् ।
उप॒ ब्रह्मा॑णि शृणव इ॒मा नोऽथा॑ ते य॒ज्ञस्त॒न्वे॒३॒॑ वयो॑ धात्

ā yāhi śaśvaduśatā yayāthendra mahā manasā somapeyam |
upa brahmāṇi śṛṇava imā no'thā te yajñastanve vayo dhāt

40.5

यदि॑न्द्र दि॒वि पार्ये॒ यदृध॒ग्यद्वा॒ स्वे सद॑ने॒ यत्र॒ वासि॑ ।
अतो॑ नो य॒ज्ञमव॑से नि॒युत्वा॑न्स॒जोषा॑ः पाहि गिर्वणो म॒रुद्भि॑ः

yadindra divi pārye yadṛdhagyadvā sve sadane yatra vāsi |
ato no yajñamavase niyutvānsajoṣāḥ pāhi girvaṇo marudbhiḥ

पाठ का स्रोत: Wikisource · CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription of a public-domain text)