अहे॑ळमान॒ उप॑ याहि य॒ज्ञं तुभ्यं॑ पवन्त॒ इन्द॑वः सु॒तास॑ः ।
गावो॒ न व॑ज्रि॒न्स्वमोको॒ अच्छेन्द्रा ग॑हि प्रथ॒मो य॒ज्ञिया॑नाम्
aheḻamāna upa yāhi yajñaṃ tubhyaṃ pavanta indavaḥ sutāsaḥ |
gāvo na vajrinsvamoko acchendrā gahi prathamo yajñiyānām
ऋषि: बार्हस्पत्यो भरद्वाजः · देवता: इन्द्रः · छन्द: त्रिष्टुप्
5 श्लोक · 41 में से 75
बार्हस्पत्य भरद्वाज त्रिष्टुप् छन्द में इन्द्र से कहते हैं कि वे बिना रोष के यज्ञ में आएँ, जैसे गायें अपनी गोशाला को लौटती हैं। उनके लिए सोम की बूँदें छनकर बह रही हैं, क्योंकि वे पूजनीयों में प्रथम हैं। कवि उस सुन्दर मुख की बात करता है जिससे इन्द्र मधु की लहर पीते हैं, और बताता है कि अध्वर्यु तैयार खड़ा है। यह सोम सब रूपों वाला वृषभ है; निचोड़ा हुआ सोम बिना निचोड़े से श्रेष्ठ है। अन्तिम मन्त्र में उन्हें शतक्रतु कहकर आनन्दित होने और युद्ध व बस्तियों में रक्षा करने की प्रार्थना है।
अहे॑ळमान॒ उप॑ याहि य॒ज्ञं तुभ्यं॑ पवन्त॒ इन्द॑वः सु॒तास॑ः ।
गावो॒ न व॑ज्रि॒न्स्वमोको॒ अच्छेन्द्रा ग॑हि प्रथ॒मो य॒ज्ञिया॑नाम्
aheḻamāna upa yāhi yajñaṃ tubhyaṃ pavanta indavaḥ sutāsaḥ |
gāvo na vajrinsvamoko acchendrā gahi prathamo yajñiyānām
या ते॑ का॒कुत्सुकृ॑ता॒ या वरि॑ष्ठा॒ यया॒ शश्व॒त्पिब॑सि॒ मध्व॑ ऊ॒र्मिम् ।
तया॑ पाहि॒ प्र ते॑ अध्व॒र्युर॑स्था॒त्सं ते॒ वज्रो॑ वर्ततामिन्द्र ग॒व्युः
yā te kākutsukṛtā yā variṣṭhā yayā śaśvatpibasi madhva ūrmim |
tayā pāhi pra te adhvaryurasthātsaṃ te vajro vartatāmindra gavyuḥ
ए॒ष द्र॒प्सो वृ॑ष॒भो वि॒श्वरू॑प॒ इन्द्रा॑य॒ वृष्णे॒ सम॑कारि॒ सोम॑ः ।
ए॒तं पि॑ब हरिवः स्थातरुग्र॒ यस्येशि॑षे प्र॒दिवि॒ यस्ते॒ अन्न॑म्
eṣa drapso vṛṣabho viśvarūpa indrāya vṛṣṇe samakāri somaḥ |
etaṃ piba harivaḥ sthātarugra yasyeśiṣe pradivi yaste annam
सु॒तः सोमो॒ असु॑तादिन्द्र॒ वस्या॑न॒यं श्रेया॑ञ्चिकि॒तुषे॒ रणा॑य ।
ए॒तं ति॑तिर्व॒ उप॑ याहि य॒ज्ञं तेन॒ विश्वा॒स्तवि॑षी॒रा पृ॑णस्व
sutaḥ somo asutādindra vasyānayaṃ śreyāñcikituṣe raṇāya |
etaṃ titirva upa yāhi yajñaṃ tena viśvāstaviṣīrā pṛṇasva
ह्वया॑मसि॒ त्वेन्द्र॑ याह्य॒र्वाङरं॑ ते॒ सोम॑स्त॒न्वे॑ भवाति ।
शत॑क्रतो मा॒दय॑स्वा सु॒तेषु॒ प्रास्माँ अ॑व॒ पृत॑नासु॒ प्र वि॒क्षु
hvayāmasi tvendra yāhyarvāṅaraṃ te somastanve bhavāti |
śatakrato mādayasvā suteṣu prāsmām̐ ava pṛtanāsu pra vikṣu
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