बळि॒त्था पर्व॑तानां खि॒द्रं बि॑भर्षि पृथिवि ।
प्र या भूमिं॑ प्रवत्वति म॒ह्ना जि॒नोषि॑ महिनि
baḻitthā parvatānāṃ khidraṃ bibharṣi pṛthivi |
pra yā bhūmiṃ pravatvati mahnā jinoṣi mahini
ऋषि: भौमोऽत्रिः · देवता: पृथिवी · छन्द: अनुष्टुप्
3 श्लोक · 84 में से 87
भौम अत्रि पृथ्वी को अनुष्टुप् के तीन मन्त्र अर्पित करते हैं। हे पृथ्वी, तुम सचमुच पर्वतों का भार उठाती हो, और हे ढलानों वाली महिमामयी, अपनी महिमा से भूमि को जीवन देती हो। हे विस्तृत विचरने वाली, रातों में स्तोत्र तुम्हारे लिए गूँजते हैं, जब तुम हिनहिनाते घोड़े की तरह अन्न आगे भेजती हो, हे उज्ज्वल। तुम अपनी दृढ़ता से वृक्षों को भी भूमि में थामे रखती हो, जब तुम्हारे बादल की बिजली से और द्युलोक से वर्षा होती है। ऋग्वेद में अकेली पृथ्वी को समर्पित यही एक सूक्त है।
बळि॒त्था पर्व॑तानां खि॒द्रं बि॑भर्षि पृथिवि ।
प्र या भूमिं॑ प्रवत्वति म॒ह्ना जि॒नोषि॑ महिनि
baḻitthā parvatānāṃ khidraṃ bibharṣi pṛthivi |
pra yā bhūmiṃ pravatvati mahnā jinoṣi mahini
स्तोमा॑सस्त्वा विचारिणि॒ प्रति॑ ष्टोभन्त्य॒क्तुभि॑ः ।
प्र या वाजं॒ न हेष॑न्तं पे॒रुमस्य॑स्यर्जुनि
stomāsastvā vicāriṇi prati ṣṭobhantyaktubhiḥ |
pra yā vājaṃ na heṣantaṃ perumasyasyarjuni
दृ॒ळ्हा चि॒द्या वन॒स्पती॑न्क्ष्म॒या दर्ध॒र्ष्योज॑सा ।
यत्ते॑ अ॒भ्रस्य॑ वि॒द्युतो॑ दि॒वो वर्ष॑न्ति वृ॒ष्टय॑ः
dṛḻhā cidyā vanaspatīnkṣmayā dardharṣyojasā |
yatte abhrasya vidyuto divo varṣanti vṛṣṭayaḥ
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