पञ्चम मण्डल

सूक्त 66: ऋत से सुशोभित वरुण और मित्र

ऋषि: रातहव्य आत्रेयः · देवता: मित्रावरुणौ · छन्द: अनुष्टुप्

6 श्लोक · 66 में से 87

इस अध्याय में क्या होता है

ऋत से सुशोभित वरुण और मित्र

रातहव्य आत्रेय अनुष्टुप् में मित्र और वरुण से बोलते हैं। वे मनुष्य से कहते हैं कि शत्रुनाशक इन दो ज्ञानी देवों को पुकारो और ऋत रूप वरुण को अर्पण करो। उनका राज्य अखण्ड है और उनका प्रभुत्व पूर्ण, जो मनुष्यों के सामने सूर्य की तरह रखा है। गायक स्तोत्रों से उनका ध्यान करता है और रथों के लिए विस्तृत चरागाह माँगता है। अपनी अद्भुत बुद्धि और पवित्र कौशल से वे जनों की देखरेख करते हैं। ऋत और महान यश ऋषियों का है, और उनकी धाराएँ विशाल पृथ्वी पर दूर तक बहती हैं। अन्त में ऋषि और दाता विस्तृत स्वराज्य की कामना करते हैं।

66.1

आ चि॑कितान सु॒क्रतू॑ दे॒वौ म॑र्त रि॒शाद॑सा ।
वरु॑णाय ऋ॒तपे॑शसे दधी॒त प्रय॑से म॒हे

ā cikitāna sukratū devau marta riśādasā |
varuṇāya ṛtapeśase dadhīta prayase mahe

66.2

ता हि क्ष॒त्रमवि॑ह्रुतं स॒म्यग॑सु॒र्य१॒॑माशा॑ते ।
अध॑ व्र॒तेव॒ मानु॑षं॒ स्व१॒॑र्ण धा॑यि दर्श॒तम्

tā hi kṣatramavihrutaṃ samyagasuryamāśāte |
adha vrateva mānuṣaṃ svarṇa dhāyi darśatam

66.3

ता वा॒मेषे॒ रथा॑नामु॒र्वीं गव्यू॑तिमेषाम् ।
रा॒तह॑व्यस्य सुष्टु॒तिं द॒धृक्स्तोमै॑र्मनामहे

tā vāmeṣe rathānāmurvīṃ gavyūtimeṣām |
rātahavyasya suṣṭutiṃ dadhṛkstomairmanāmahe

66.4

अधा॒ हि काव्या॑ यु॒वं दक्ष॑स्य पू॒र्भिर॑द्भुता ।
नि के॒तुना॒ जना॑नां चि॒केथे॑ पूतदक्षसा

adhā hi kāvyā yuvaṃ dakṣasya pūrbhiradbhutā |
ni ketunā janānāṃ cikethe pūtadakṣasā

66.5

तदृ॒तं पृ॑थिवि बृ॒हच्छ्र॑वए॒ष ऋषी॑णाम् ।
ज्र॒य॒सा॒नावरं॑ पृ॒थ्वति॑ क्षरन्ति॒ याम॑भिः

tadṛtaṃ pṛthivi bṛhacchravaeṣa ṛṣīṇām |
jrayasānāvaraṃ pṛthvati kṣaranti yāmabhiḥ

66.6

आ यद्वा॑मीयचक्षसा॒ मित्र॑ व॒यं च॑ सू॒रय॑ः ।
व्यचि॑ष्ठे बहु॒पाय्ये॒ यते॑महि स्व॒राज्ये॑

ā yadvāmīyacakṣasā mitra vayaṃ ca sūrayaḥ |
vyaciṣṭhe bahupāyye yatemahi svarājye

पाठ का स्रोत: Wikisource · CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription of a public-domain text)