यश्चि॒केत॒ स सु॒क्रतु॑र्देव॒त्रा स ब्र॑वीतु नः ।
वरु॑णो॒ यस्य॑ दर्श॒तो मि॒त्रो वा॒ वन॑ते॒ गिर॑ः
yaściketa sa sukraturdevatrā sa bravītu naḥ |
varuṇo yasya darśato mitro vā vanate giraḥ
ऋषि: रातहव्य आत्रेयः · देवता: मित्रावरुणौ · छन्द: अनुष्टुप्, ६ पङ्क्तिः
6 श्लोक · 65 में से 87
रातहव्य आत्रेय अनुष्टुप् में, अन्तिम मन्त्र पङ्क्ति में, मित्र और वरुण की स्तुति करते हैं। देवों में जो ज्ञानी है वह हमारे लिए बोले, जिसकी वाणी सुन्दर वरुण या मित्र स्वीकारते हैं। वे श्रेष्ठ तेज वाले राजा हैं, दूर से भी सुनने वाले, सज्जनों के स्वामी, हर जन में ऋत से बढ़ने वाले। मित्र संकट में से भी निवास का मार्ग निकालते हैं, और उनकी सुमति उपासक पर रहती है। हम मित्र की सबसे विस्तृत रक्षा में निष्पाप रहें, वरुण की छाया में। अन्तिम मन्त्र कहता है कि वे जनों को जोड़ें, उदार दाताओं की उपेक्षा न करें और ऋषियों की रक्षा करें।
यश्चि॒केत॒ स सु॒क्रतु॑र्देव॒त्रा स ब्र॑वीतु नः ।
वरु॑णो॒ यस्य॑ दर्श॒तो मि॒त्रो वा॒ वन॑ते॒ गिर॑ः
yaściketa sa sukraturdevatrā sa bravītu naḥ |
varuṇo yasya darśato mitro vā vanate giraḥ
ता हि श्रेष्ठ॑वर्चसा॒ राजा॑ना दीर्घ॒श्रुत्त॑मा ।
ता सत्प॑ती ऋता॒वृध॑ ऋ॒तावा॑ना॒ जने॑जने
tā hi śreṣṭhavarcasā rājānā dīrghaśruttamā |
tā satpatī ṛtāvṛdha ṛtāvānā janejane
ता वा॑मिया॒नोऽव॑से॒ पूर्वा॒ उप॑ ब्रुवे॒ सचा॑ ।
स्वश्वा॑स॒ः सु चे॒तुना॒ वाजाँ॑ अ॒भि प्र दा॒वने॑
tā vāmiyāno'vase pūrvā upa bruve sacā |
svaśvāsaḥ su cetunā vājām̐ abhi pra dāvane
मि॒त्रो अं॒होश्चि॒दादु॒रु क्षया॑य गा॒तुं व॑नते ।
मि॒त्रस्य॒ हि प्र॒तूर्व॑तः सुम॒तिरस्ति॑ विध॒तः
mitro aṃhościdāduru kṣayāya gātuṃ vanate |
mitrasya hi pratūrvataḥ sumatirasti vidhataḥ
व॒यं मि॒त्रस्याव॑सि॒ स्याम॑ स॒प्रथ॑स्तमे ।
अ॒ने॒हस॒स्त्वोत॑यः स॒त्रा वरु॑णशेषसः
vayaṃ mitrasyāvasi syāma saprathastame |
anehasastvotayaḥ satrā varuṇaśeṣasaḥ
यु॒वं मि॑त्रे॒मं जनं॒ यत॑थ॒ः सं च॑ नयथः ।
मा म॒घोन॒ः परि॑ ख्यतं॒ मो अ॒स्माक॒मृषी॑णां गोपी॒थे न॑ उरुष्यतम्
yuvaṃ mitremaṃ janaṃ yatathaḥ saṃ ca nayathaḥ |
mā maghonaḥ pari khyataṃ mo asmākamṛṣīṇāṃ gopīthe na uruṣyatam
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