पञ्चम मण्डल

सूक्त 49: रत्न बाँटने वाले सविता देव

ऋषि: प्रतिप्रभ आत्रेयः ( ५ तृणपाणिः) · देवता: विश्वे देवाः · छन्द: त्रिष्टुप्

5 श्लोक · 49 में से 87

इस अध्याय में क्या होता है

रत्न बाँटने वाले सविता देव

प्रतिप्रभ आत्रेय, और अन्तिम मन्त्र में तृणपाणि, त्रिष्टुप् में विश्वेदेवों से बोलते हैं। ऋषि आज सविता और भग के पास आते हैं, जो मनुष्यों में रत्न बाँटते हैं, और अश्विनीकुमारों को मित्र मानकर अपनी ओर बुलाते हैं। स्वामी के मार्ग को जानकर वे उपासक से कहते हैं कि सूक्तों और नमन से सविता की सेवा करो। पूषा, भग, अदिति, इन्द्र, विष्णु, वरुण, मित्र और अग्नि शुभ दिनों को जन्म देते हैं। ऋषि सविता से आश्रय माँगते हैं, नदियाँ अपनी ओर बहें यह चाहते हैं और धन के स्वामी बनने की प्रार्थना करते हैं। अन्त में विनती है कि अनिष्ट दूर हो और विस्तृत स्थान मिले।

49.1

दे॒वं वो॑ अ॒द्य स॑वि॒तार॒मेषे॒ भगं॑ च॒ रत्नं॑ वि॒भज॑न्तमा॒योः ।
आ वां॑ नरा पुरुभुजा ववृत्यां दि॒वेदि॑वे चिदश्विना सखी॒यन्

devaṃ vo adya savitārameṣe bhagaṃ ca ratnaṃ vibhajantamāyoḥ |
ā vāṃ narā purubhujā vavṛtyāṃ divedive cidaśvinā sakhīyan

49.2

प्रति॑ प्र॒याण॒मसु॑रस्य वि॒द्वान्सू॒क्तैर्दे॒वं स॑वि॒तारं॑ दुवस्य ।
उप॑ ब्रुवीत॒ नम॑सा विजा॒नञ्ज्येष्ठं॑ च॒ रत्नं॑ वि॒भज॑न्तमा॒योः

prati prayāṇamasurasya vidvānsūktairdevaṃ savitāraṃ duvasya |
upa bruvīta namasā vijānañjyeṣṭhaṃ ca ratnaṃ vibhajantamāyoḥ

49.3

अ॒द॒त्र॒या द॑यते॒ वार्या॑णि पू॒षा भगो॒ अदि॑ति॒र्वस्त॑ उ॒स्रः ।
इन्द्रो॒ विष्णु॒र्वरु॑णो मि॒त्रो अ॒ग्निरहा॑नि भ॒द्रा ज॑नयन्त द॒स्माः

adatrayā dayate vāryāṇi pūṣā bhago aditirvasta usraḥ |
indro viṣṇurvaruṇo mitro agnirahāni bhadrā janayanta dasmāḥ

49.4

तन्नो॑ अन॒र्वा स॑वि॒ता वरू॑थं॒ तत्सिन्ध॑व इ॒षय॑न्तो॒ अनु॑ ग्मन् ।
उप॒ यद्वोचे॑ अध्व॒रस्य॒ होता॑ रा॒यः स्या॑म॒ पत॑यो॒ वाज॑रत्नाः

tanno anarvā savitā varūthaṃ tatsindhava iṣayanto anu gman |
upa yadvoce adhvarasya hotā rāyaḥ syāma patayo vājaratnāḥ

49.5

प्र ये वसु॑भ्य॒ ईव॒दा नमो॒ दुर्ये मि॒त्रे वरु॑णे सू॒क्तवा॑चः ।
अवै॒त्वभ्वं॑ कृणु॒ता वरी॑यो दि॒वस्पृ॑थि॒व्योरव॑सा मदेम

pra ye vasubhya īvadā namo durye mitre varuṇe sūktavācaḥ |
avaitvabhvaṃ kṛṇutā varīyo divaspṛthivyoravasā madema

पाठ का स्रोत: Wikisource · CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription of a public-domain text)