अ॒ग्निं स्तोमे॑न बोधय समिधा॒नो अम॑र्त्यम् ।
ह॒व्या दे॒वेषु॑ नो दधत्
agniṃ stomena bodhaya samidhāno amartyam |
havyā deveṣu no dadhat
ऋषि: सुतंभर आत्रेयः · देवता: अग्निः · छन्द: गायत्री
6 श्लोक · 14 में से 87
आत्रेय सुतंभर गायत्री में यजमान से कहते हैं कि अमर अग्नि को प्रज्वलित करते हुए स्तुति से जगाओ, ताकि वे हवि देवों तक रखें। मर्त्य यज्ञ में उन्हें मनुष्यों के बीच सबसे श्रेष्ठ यजन करने वाला मानकर पूजते हैं, और घी टपकाती स्रुवा से आहुति देते हैं ताकि वे हवि ले जाएँ। एक मन्त्र में पूरा कर्म है: जन्म लेते ही अग्नि चमक उठे, अपनी ज्योति से दस्युओं और अन्धकार को मारा, और गायें, जल और स्वर्ज्योति पाईं। ऋषि सबसे कहते हैं कि इस घृतपृष्ठ कवि की सेवा करो और सुविचारित वचनों से उन्हें बढ़ाओ।
अ॒ग्निं स्तोमे॑न बोधय समिधा॒नो अम॑र्त्यम् ।
ह॒व्या दे॒वेषु॑ नो दधत्
agniṃ stomena bodhaya samidhāno amartyam |
havyā deveṣu no dadhat
तम॑ध्व॒रेष्वी॑ळते दे॒वं मर्ता॒ अम॑र्त्यम् ।
यजि॑ष्ठं॒ मानु॑षे॒ जने॑
tamadhvareṣvīḻate devaṃ martā amartyam |
yajiṣṭhaṃ mānuṣe jane
तं हि शश्व॑न्त॒ ईळ॑ते स्रु॒चा दे॒वं घृ॑त॒श्चुता॑ ।
अ॒ग्निं ह॒व्याय॒ वोळ्ह॑वे
taṃ hi śaśvanta īḻate srucā devaṃ ghṛtaścutā |
agniṃ havyāya voḻhave
अ॒ग्निर्जा॒तो अ॑रोचत॒ घ्नन्दस्यू॒ञ्ज्योति॑षा॒ तम॑ः ।
अवि॑न्द॒द्गा अ॒पः स्व॑ः
agnirjāto arocata ghnandasyūñjyotiṣā tamaḥ |
avindadgā apaḥ svaḥ
अ॒ग्निमी॒ळेन्यं॑ क॒विं घृ॒तपृ॑ष्ठं सपर्यत ।
वेतु॑ मे शृ॒णव॒द्धव॑म्
agnimīḻenyaṃ kaviṃ ghṛtapṛṣṭhaṃ saparyata |
vetu me śṛṇavaddhavam
अ॒ग्निं घृ॒तेन॑ वावृधु॒ः स्तोमे॑भिर्वि॒श्वच॑र्षणिम् ।
स्वा॒धीभि॑र्वच॒स्युभि॑ः
agniṃ ghṛtena vāvṛdhuḥ stomebhirviśvacarṣaṇim |
svādhībhirvacasyubhiḥ
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