चतुर्थ मण्डल

सूक्त 11: अग्नि से ही काव्य और स्तोत्र

ऋषि: वामदेवो गौतमः · देवता: अग्निः · छन्द: त्रिष्टुप्

6 श्लोक · 11 में से 58

इस अध्याय में क्या होता है

अग्नि से ही काव्य और स्तोत्र

वामदेव गौतम का अग्नि को त्रिष्टुप् छन्द में छोटा सूक्त। अग्नि का मङ्गल मुख सूर्य के समीप चमकता है, रात में भी उजला। गायक प्रार्थना करता है कि अग्नि उसकी मनीषा का मार्ग खोलें। वह कहता है, अग्नि से ही काव्य, मनीषाएँ और सिद्धि देने वाले स्तोत्र उपजते हैं; अग्नि से ही वीरों से सजा धन, वेगवान घोड़ा और देवों का भेजा ऐश्वर्य आता है। देवों को चाहने वाले मनुष्य पहले मधुर जिह्वा वाले गृहपति अग्नि की सेवा करते हैं। अन्त में प्रार्थना है कि वे दुर्बुद्धि, पाप और हर दुर्भावना हमसे दूर रखें और रात में कल्याणकारी हों।

11.1

भ॒द्रं ते॑ अग्ने सहसि॒न्ननी॑कमुपा॒क आ रो॑चते॒ सूर्य॑स्य ।
रुश॑द्दृ॒शे द॑दृशे नक्त॒या चि॒दरू॑क्षितं दृ॒श आ रू॒पे अन्न॑म्

bhadraṃ te agne sahasinnanīkamupāka ā rocate sūryasya |
ruśaddṛśe dadṛśe naktayā cidarūkṣitaṃ dṛśa ā rūpe annam

11.2

वि षा॑ह्यग्ने गृण॒ते म॑नी॒षां खं वेप॑सा तुविजात॒ स्तवा॑नः ।
विश्वे॑भि॒र्यद्वा॒वन॑ः शुक्र दे॒वैस्तन्नो॑ रास्व सुमहो॒ भूरि॒ मन्म॑

vi ṣāhyagne gṛṇate manīṣāṃ khaṃ vepasā tuvijāta stavānaḥ |
viśvebhiryadvāvanaḥ śukra devaistanno rāsva sumaho bhūri manma

11.3

त्वद॑ग्ने॒ काव्या॒ त्वन्म॑नी॒षास्त्वदु॒क्था जा॑यन्ते॒ राध्या॑नि ।
त्वदे॑ति॒ द्रवि॑णं वी॒रपे॑शा इ॒त्थाधि॑ये दा॒शुषे॒ मर्त्या॑य

tvadagne kāvyā tvanmanīṣāstvadukthā jāyante rādhyāni |
tvadeti draviṇaṃ vīrapeśā itthādhiye dāśuṣe martyāya

11.4

त्वद्वा॒जी वा॑जम्भ॒रो विहा॑या अभिष्टि॒कृज्जा॑यते स॒त्यशु॑ष्मः ।
त्वद्र॒यिर्दे॒वजू॑तो मयो॒भुस्त्वदा॒शुर्जू॑जु॒वाँ अ॑ग्ने॒ अर्वा॑

tvadvājī vājambharo vihāyā abhiṣṭikṛjjāyate satyaśuṣmaḥ |
tvadrayirdevajūto mayobhustvadāśurjūjuvām̐ agne arvā

11.5

त्वाम॑ग्ने प्रथ॒मं दे॑व॒यन्तो॑ दे॒वं मर्ता॑ अमृत म॒न्द्रजि॑ह्वम् ।
द्वे॒षो॒युत॒मा वि॑वासन्ति धी॒भिर्दमू॑नसं गृ॒हप॑ति॒ममू॑रम्

tvāmagne prathamaṃ devayanto devaṃ martā amṛta mandrajihvam |
dveṣoyutamā vivāsanti dhībhirdamūnasaṃ gṛhapatimamūram

11.6

आ॒रे अ॒स्मदम॑तिमा॒रे अंह॑ आ॒रे विश्वां॑ दुर्म॒तिं यन्नि॒पासि॑ ।
दो॒षा शि॒वः स॑हसः सूनो अग्ने॒ यं दे॒व आ चि॒त्सच॑से स्व॒स्ति

āre asmadamatimāre aṃha āre viśvāṃ durmatiṃ yannipāsi |
doṣā śivaḥ sahasaḥ sūno agne yaṃ deva ā citsacase svasti

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