द्वितीय मण्डल

सूक्त 26: सरल स्तोता की विजय

ऋषि: गृत्समद (आङ्गिरसः शौनहोत्रः पश्चाद्) भार्गवः शौनकः · देवता: ब्रह्मणस्पतिः · छन्द: जगती

4 श्लोक · 26 में से 43

इस अध्याय में क्या होता है

सरल स्तोता की विजय

ब्रह्मणस्पति के लिए गृत्समद के चार छोटे जगती मन्त्र। सरल स्तोता आक्रमणकारी को जीतता है, देवों को चाहने वाला देवों को न चाहने वाले को जीतता है। यज्ञ करने वाला यज्ञ न करने वाले का भाग पाता है। ऋषि वीर से कहते हैं, यजन करो, वृत्र के विरुद्ध संग्राम में मन को कल्याण की ओर लगाओ, और ब्रह्मणस्पति की रक्षा चुनो। जो देवों के पिता ब्रह्मणस्पति को श्रद्धा भरे मन और हवि से पूजता है, वह अपने जन, कुल और पुत्रों के साथ बल और धन पाता है। ब्रह्मणस्पति ऐसे व्यक्ति को आगे ले जाते हैं, पाप और हानि से बचाते हैं और उसका मार्ग चौड़ा करते हैं।

26.1

ऋ॒जुरिच्छंसो॑ वनवद्वनुष्य॒तो दे॑व॒यन्निददे॑वयन्तम॒भ्य॑सत् ।
सु॒प्रा॒वीरिद्व॑नवत्पृ॒त्सु दु॒ष्टरं॒ यज्वेदय॑ज्यो॒र्वि भ॑जाति॒ भोज॑नम्

ṛjuricchaṃso vanavadvanuṣyato devayannidadevayantamabhyasat |
suprāvīridvanavatpṛtsu duṣṭaraṃ yajvedayajyorvi bhajāti bhojanam

26.2

यज॑स्व वीर॒ प्र वि॑हि मनाय॒तो भ॒द्रं मन॑ः कृणुष्व वृत्र॒तूर्ये॑ ।
ह॒विष्कृ॑णुष्व सु॒भगो॒ यथास॑सि॒ ब्रह्म॑ण॒स्पते॒रव॒ आ वृ॑णीमहे

yajasva vīra pra vihi manāyato bhadraṃ manaḥ kṛṇuṣva vṛtratūrye |
haviṣkṛṇuṣva subhago yathāsasi brahmaṇaspaterava ā vṛṇīmahe

26.3

स इज्जने॑न॒ स वि॒शा स जन्म॑ना॒ स पु॒त्रैर्वाजं॑ भरते॒ धना॒ नृभि॑ः ।
दे॒वानां॒ यः पि॒तर॑मा॒विवा॑सति श्र॒द्धाम॑ना ह॒विषा॒ ब्रह्म॑ण॒स्पति॑म्

sa ijjanena sa viśā sa janmanā sa putrairvājaṃ bharate dhanā nṛbhiḥ |
devānāṃ yaḥ pitaramāvivāsati śraddhāmanā haviṣā brahmaṇaspatim

26.4

यो अ॑स्मै ह॒व्यैर्घृ॒तव॑द्भि॒रवि॑ध॒त्प्र तं प्रा॒चा न॑यति॒ ब्रह्म॑ण॒स्पति॑ः ।
उ॒रु॒ष्यती॒मंह॑सो॒ रक्ष॑ती रि॒षों॒३॒॑ऽहोश्चि॑दस्मा उरु॒चक्रि॒रद्भु॑तः

yo asmai havyairghṛtavadbhiravidhatpra taṃ prācā nayati brahmaṇaspatiḥ |
uruṣyatīmaṃhaso rakṣatī riṣoṃ'hościdasmā urucakriradbhutaḥ

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