द्वितीय मण्डल

सूक्त 21: सर्वविजेता इन्द्र को सोम

ऋषि: गृत्समद (आङ्गिरसः शौनहोत्रः पश्चाद्) भार्गवः शौनकः · देवता: इन्द्रः · छन्द: जगती, ६ त्रिष्टुप्

6 श्लोक · 21 में से 43

इस अध्याय में क्या होता है

सर्वविजेता इन्द्र को सोम

गृत्समद का यह छोटा जगती सूक्त उपाधियों की माला से आरम्भ होता है: सबको जीतने वाले, धन, सूर्य, मनुष्य, खेत, अश्व, गौ और जल को जीतने वाले इन्द्र के लिए मनोहर सोम लाओ। उस अभिभावी, अजेय, गम्भीर और ऊँचे वृषभ को नमस्कार कहो, जिसकी प्रज्ञा की बराबरी कोई नहीं कर सकता। ऋषि स्मरण करते हैं कि मनीषी उशिजों ने बैठकर गाते हुए यज्ञ से मार्ग पाया और गौएँ जीतीं। अन्तिम त्रिष्टुप् मन्त्र प्रिय प्रार्थना है: श्रेष्ठ धन दो, दक्षता की समझ, सौभाग्य, धन की पुष्टि, शरीरों की आरोग्यता, वाणी की मधुरता और दिनों का सुदिन होना।

21.1

वि॒श्व॒जिते॑ धन॒जिते॑ स्व॒र्जिते॑ सत्रा॒जिते॑ नृ॒जित॑ उर्वरा॒जिते॑ ।
अ॒श्व॒जिते॑ गो॒जिते॑ अ॒ब्जिते॑ भ॒रेन्द्रा॑य॒ सोमं॑ यज॒ताय॑ हर्य॒तम्

viśvajite dhanajite svarjite satrājite nṛjita urvarājite |
aśvajite gojite abjite bharendrāya somaṃ yajatāya haryatam

21.2

अ॒भि॒भुवे॑ऽभिभ॒ङ्गाय॑ वन्व॒तेऽषा॑ळ्हाय॒ सह॑मानाय वे॒धसे॑ ।
तु॒वि॒ग्रये॒ वह्न॑ये दु॒ष्टरी॑तवे सत्रा॒साहे॒ नम॒ इन्द्रा॑य वोचत

abhibhuve'bhibhaṅgāya vanvate'ṣāḻhāya sahamānāya vedhase |
tuvigraye vahnaye duṣṭarītave satrāsāhe nama indrāya vocata

21.3

स॒त्रा॒सा॒हो ज॑नभ॒क्षो ज॑नंस॒हश्च्यव॑नो यु॒ध्मो अनु॒ जोष॑मुक्षि॒तः ।
वृ॒तं॒च॒यः सहु॑रिर्वि॒क्ष्वा॑रि॒त इन्द्र॑स्य वोचं॒ प्र कृ॒तानि॑ वी॒र्या॑

satrāsāho janabhakṣo janaṃsahaścyavano yudhmo anu joṣamukṣitaḥ |
vṛtaṃcayaḥ sahurirvikṣvārita indrasya vocaṃ pra kṛtāni vīryā

21.4

अ॒ना॒नु॒दो वृ॑ष॒भो दोध॑तो व॒धो ग॑म्भी॒र ऋ॒ष्वो अस॑मष्टकाव्यः ।
र॒ध्र॒चो॒दः श्नथ॑नो वीळि॒तस्पृ॒थुरिन्द्र॑ः सुय॒ज्ञ उ॒षस॒ः स्व॑र्जनत्

anānudo vṛṣabho dodhato vadho gambhīra ṛṣvo asamaṣṭakāvyaḥ |
radhracodaḥ śnathano vīḻitaspṛthurindraḥ suyajña uṣasaḥ svarjanat

21.5

य॒ज्ञेन॑ गा॒तुम॒प्तुरो॑ विविद्रिरे॒ धियो॑ हिन्वा॒ना उ॒शिजो॑ मनी॒षिण॑ः ।
अ॒भि॒स्वरा॑ नि॒षदा॒ गा अ॑व॒स्यव॒ इन्द्रे॑ हिन्वा॒ना द्रवि॑णान्याशत

yajñena gātumapturo vividrire dhiyo hinvānā uśijo manīṣiṇaḥ |
abhisvarā niṣadā gā avasyava indre hinvānā draviṇānyāśata

21.6

इन्द्र॒ श्रेष्ठा॑नि॒ द्रवि॑णानि धेहि॒ चित्तिं॒ दक्ष॑स्य सुभग॒त्वम॒स्मे ।
पोषं॑ रयी॒णामरि॑ष्टिं त॒नूनां॑ स्वा॒द्मानं॑ वा॒चः सु॑दिन॒त्वमह्ना॑म्

indra śreṣṭhāni draviṇāni dhehi cittiṃ dakṣasya subhagatvamasme |
poṣaṃ rayīṇāmariṣṭiṃ tanūnāṃ svādmānaṃ vācaḥ sudinatvamahnām

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