दशम मण्डल

सूक्त 58: दूर गए मन को लौटाना

ऋषि: बन्धुः श्रुतबन्धुर्विप्रबन्धुर्गौपायनाः · देवता: मन आवर्तनम् · छन्द: अनुष्टुप्

12 श्लोक · 58 में से 191

इस अध्याय में क्या होता है

दूर गए मन को लौटाना

गौपायन भाई यहाँ स्वयं मन को सम्बोधित करते हैं; देवता मन का आवर्तन है, और बारह अनुष्टुप् मन्त्र हैं। हर मन्त्र किसी दूर स्थान का नाम लेता है जहाँ मन गया, और एक ही पंक्ति पर रुकता है: हम उसे तुम्हारे पास लौटाते हैं, यहाँ बसने और जीने के लिए। मन वैवस्वत यम के पास गया है, द्युलोक और पृथिवी पर, चार कोनों वाली भूमि पर, चारों दिशाओं में, समुद्र में, फैलती किरणों में, जल और ओषधियों में, सूर्य और उषा में, बड़े पर्वतों पर, इस सारे चलते जगत में, सबसे दूर की दूरियों में, और भूत तथा भविष्य में।

58.1

यत्ते॑ य॒मं वै॑वस्व॒तं मनो॑ ज॒गाम॑ दूर॒कम् ।
तत्त॒ आ व॑र्तयामसी॒ह क्षया॑य जी॒वसे॑

yatte yamaṃ vaivasvataṃ mano jagāma dūrakam |
tatta ā vartayāmasīha kṣayāya jīvase

58.2

यत्ते॒ दिवं॒ यत्पृ॑थि॒वीं मनो॑ ज॒गाम॑ दूर॒कम् ।
तत्त॒ आ व॑र्तयामसी॒ह क्षया॑य जी॒वसे॑

yatte divaṃ yatpṛthivīṃ mano jagāma dūrakam |
tatta ā vartayāmasīha kṣayāya jīvase

58.3

यत्ते॒ भूमिं॒ चतु॑र्भृष्टिं॒ मनो॑ ज॒गाम॑ दूर॒कम् ।
तत्त॒ आ व॑र्तयामसी॒ह क्षया॑य जी॒वसे॑

yatte bhūmiṃ caturbhṛṣṭiṃ mano jagāma dūrakam |
tatta ā vartayāmasīha kṣayāya jīvase

58.4

यत्ते॒ चत॑स्रः प्र॒दिशो॒ मनो॑ ज॒गाम॑ दूर॒कम् ।
तत्त॒ आ व॑र्तयामसी॒ह क्षया॑य जी॒वसे॑

yatte catasraḥ pradiśo mano jagāma dūrakam |
tatta ā vartayāmasīha kṣayāya jīvase

58.5

यत्ते॑ समु॒द्रम॑र्ण॒वं मनो॑ ज॒गाम॑ दूर॒कम् ।
तत्त॒ आ व॑र्तयामसी॒ह क्षया॑य जी॒वसे॑

yatte samudramarṇavaṃ mano jagāma dūrakam |
tatta ā vartayāmasīha kṣayāya jīvase

58.6

यत्ते॒ मरी॑चीः प्र॒वतो॒ मनो॑ ज॒गाम॑ दूर॒कम् ।
तत्त॒ आ व॑र्तयामसी॒ह क्षया॑य जी॒वसे॑

yatte marīcīḥ pravato mano jagāma dūrakam |
tatta ā vartayāmasīha kṣayāya jīvase

58.7

यत्ते॑ अ॒पो यदोष॑धी॒र्मनो॑ ज॒गाम॑ दूर॒कम् ।
तत्त॒ आ व॑र्तयामसी॒ह क्षया॑य जी॒वसे॑

yatte apo yadoṣadhīrmano jagāma dūrakam |
tatta ā vartayāmasīha kṣayāya jīvase

58.8

यत्ते॒ सूर्यं॒ यदु॒षसं॒ मनो॑ ज॒गाम॑ दूर॒कम् ।
तत्त॒ आ व॑र्तयामसी॒ह क्षया॑य जी॒वसे॑

yatte sūryaṃ yaduṣasaṃ mano jagāma dūrakam |
tatta ā vartayāmasīha kṣayāya jīvase

58.9

यत्ते॒ पर्व॑तान्बृह॒तो मनो॑ ज॒गाम॑ दूर॒कम् ।
तत्त॒ आ व॑र्तयामसी॒ह क्षया॑य जी॒वसे॑

yatte parvatānbṛhato mano jagāma dūrakam |
tatta ā vartayāmasīha kṣayāya jīvase

58.10

यत्ते॒ विश्व॑मि॒दं जग॒न्मनो॑ ज॒गाम॑ दूर॒कम् ।
तत्त॒ आ व॑र्तयामसी॒ह क्षया॑य जी॒वसे॑

yatte viśvamidaṃ jaganmano jagāma dūrakam |
tatta ā vartayāmasīha kṣayāya jīvase

58.11

यत्ते॒ परा॑ः परा॒वतो॒ मनो॑ ज॒गाम॑ दूर॒कम् ।
तत्त॒ आ व॑र्तयामसी॒ह क्षया॑य जी॒वसे॑

yatte parāḥ parāvato mano jagāma dūrakam |
tatta ā vartayāmasīha kṣayāya jīvase

58.12

यत्ते॑ भू॒तं च॒ भव्यं॑ च॒ मनो॑ ज॒गाम॑ दूर॒कम् ।
तत्त॒ आ व॑र्तयामसी॒ह क्षया॑य जी॒वसे॑

yatte bhūtaṃ ca bhavyaṃ ca mano jagāma dūrakam |
tatta ā vartayāmasīha kṣayāya jīvase

पाठ का स्रोत: Wikisource · CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription of a public-domain text)