दशम मण्डल

सूक्त 41: भोर में अश्विनों का त्रिचक्र रथ

ऋषि: सुहस्त्यो घौषेयः · देवता: अश्विनौ · छन्द: जगती

3 श्लोक · 41 में से 191

इस अध्याय में क्या होता है

भोर में अश्विनों का त्रिचक्र रथ

सुहस्त्य घौषेय तीन जगती मन्त्रों में अश्विनीकुमारों को बुलाते हैं। उषा के उजाले में यजमान उस त्रिचक्र रथ का आवाहन करते हैं जिसे सब पुकारते हैं, जो सारे जगत की परिक्रमा करता है और हर सवन में पहुँचता है। नासत्य भोर में ही इस मधु से लदे रथ पर चढ़ते हैं और यज्ञ करने वालों के घर जाते हैं। चाहे वे मधु हाथ में लिए अध्वर्यु के पास जाएँ, अग्नि जगाने वाले के पास या कवि के सवन में, ऋषि की विनती है कि यहाँ आकर मधु पिएँ।

41.1

स॒मा॒नमु॒ त्यं पु॑रुहू॒तमु॒क्थ्यं१॒॑ रथं॑ त्रिच॒क्रं सव॑ना॒ गनि॑ग्मतम् ।
परि॑ज्मानं विद॒थ्यं॑ सुवृ॒क्तिभि॑र्व॒यं व्यु॑ष्टा उ॒षसो॑ हवामहे

samānamu tyaṃ puruhūtamukthyaṃ rathaṃ tricakraṃ savanā ganigmatam |
parijmānaṃ vidathyaṃ suvṛktibhirvayaṃ vyuṣṭā uṣaso havāmahe

41.2

प्रा॒त॒र्युजं॑ नास॒त्याधि॑ तिष्ठथः प्रात॒र्यावा॑णं मधु॒वाह॑नं॒ रथ॑म् ।
विशो॒ येन॒ गच्छ॑थो॒ यज्व॑रीर्नरा की॒रेश्चि॑द्य॒ज्ञं होतृ॑मन्तमश्विना

prātaryujaṃ nāsatyādhi tiṣṭhathaḥ prātaryāvāṇaṃ madhuvāhanaṃ ratham |
viśo yena gacchatho yajvarīrnarā kīreścidyajñaṃ hotṛmantamaśvinā

41.3

अ॒ध्व॒र्युं वा॒ मधु॑पाणिं सु॒हस्त्य॑म॒ग्निधं॑ वा धृ॒तद॑क्षं॒ दमू॑नसम् ।
विप्र॑स्य वा॒ यत्सव॑नानि॒ गच्छ॒थोऽत॒ आ या॑तं मधु॒पेय॑मश्विना

adhvaryuṃ vā madhupāṇiṃ suhastyamagnidhaṃ vā dhṛtadakṣaṃ damūnasam |
viprasya vā yatsavanāni gacchatho'ta ā yātaṃ madhupeyamaśvinā

पाठ का स्रोत: Wikisource · CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription of a public-domain text)