अरा॑यि॒ काणे॒ विक॑टे गि॒रिं ग॑च्छ सदान्वे ।
शि॒रिम्बि॑ठस्य॒ सत्व॑भि॒स्तेभि॑ष्ट्वा चातयामसि
arāyi kāṇe vikaṭe giriṃ gaccha sadānve |
śirimbiṭhasya satvabhistebhiṣṭvā cātayāmasi
ऋषि: शिरिम्बिठो भारद्वाजः · देवता: अलक्ष्मीघ्नम्, २-३ ब्रह्मणस्पतिः, ५ विश्वे देवाः · छन्द: अनुष्टुप्
5 श्लोक · 155 में से 191
शिरिम्बिठ भारद्वाज अलक्ष्मी, अर्थात् दुर्भाग्य, के विरुद्ध बोलते हैं; दो मन्त्रों में ब्रह्मणस्पति और अन्तिम में विश्वेदेव देवता हैं, छन्द अनुष्टुप्। हे कृपण, कानी, विकट, सदा चिल्लाने वाली, पर्वत को जाओ; हम शिरिम्बिठ के बलवानों से तुम्हें भगाते हैं। तीखे सींगों वाले ब्रह्मणस्पति से उसे धकेल देने को कहा जाता है। वह लकड़ी समुद्र के उस पार बिना मनुष्य के तैरती है; उसे पकड़ो और और भी दूर चली जाओ। इन्द्र के शत्रु मारे गए, बुलबुलों की तरह मिट गए। अन्तिम मन्त्र आशीर्वाद है: उन्होंने गाय की परिक्रमा कराई, अग्नि को चारों ओर ले गए, देवों में यश पाया। इन्हें कौन दबा सकता है?
अरा॑यि॒ काणे॒ विक॑टे गि॒रिं ग॑च्छ सदान्वे ।
शि॒रिम्बि॑ठस्य॒ सत्व॑भि॒स्तेभि॑ष्ट्वा चातयामसि
arāyi kāṇe vikaṭe giriṃ gaccha sadānve |
śirimbiṭhasya satvabhistebhiṣṭvā cātayāmasi
च॒त्तो इ॒तश्च॒त्तामुत॒ः सर्वा॑ भ्रू॒णान्या॒रुषी॑ ।
अ॒रा॒य्यं॑ ब्रह्मणस्पते॒ तीक्ष्ण॑शृण्गोदृ॒षन्नि॑हि
catto itaścattāmutaḥ sarvā bhrūṇānyāruṣī |
arāyyaṃ brahmaṇaspate tīkṣṇaśṛṇgodṛṣannihi
अ॒दो यद्दारु॒ प्लव॑ते॒ सिन्धो॑ः पा॒रे अ॑पूरु॒षम् ।
तदा र॑भस्व दुर्हणो॒ तेन॑ गच्छ परस्त॒रम्
ado yaddāru plavate sindhoḥ pāre apūruṣam |
tadā rabhasva durhaṇo tena gaccha parastaram
यद्ध॒ प्राची॒रज॑ग॒न्तोरो॑ मण्डूरधाणिकीः ।
ह॒ता इन्द्र॑स्य॒ शत्र॑व॒ः सर्वे॑ बुद्बु॒दया॑शवः
yaddha prācīrajagantoro maṇḍūradhāṇikīḥ |
hatā indrasya śatravaḥ sarve budbudayāśavaḥ
परी॒मे गाम॑नेषत॒ पर्य॒ग्निम॑हृषत ।
दे॒वेष्व॑क्रत॒ श्रव॒ः क इ॒माँ आ द॑धर्षति
parīme gāmaneṣata paryagnimahṛṣata |
deveṣvakrata śravaḥ ka imām̐ ā dadharṣati
पाठ का स्रोत: Wikisource · CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription of a public-domain text)