अप॑ न॒ः शोशु॑चद॒घमग्ने॑ शुशु॒ग्ध्या र॒यिम् ।
अप॑ न॒ः शोशु॑चद॒घम्
apa naḥ śośucadaghamagne śuśugdhyā rayim |
apa naḥ śośucadagham
ऋषि: कुत्स आङ्गिरसः · देवता: अग्निः, शुचिरग्निर्वा · छन्द: गायत्री
8 श्लोक · 97 में से 191
अप नः शोशुचदघम्, हमारा पाप जलकर दूर हो जाए: कुत्स आंगिरस शुचि अग्नि के लिए गायत्री छन्द के आठों मन्त्रों में यही पंक्ति दोहराते हैं। यह शुद्धि की प्रिय प्रार्थना है, जो हवन और नित्य उपासना में पढ़ी जाती है। ऋषि अग्नि से माँगते हैं कि वे धन को हमारी ओर प्रकाशित करें; हम उत्तम खेत, अच्छे मार्ग और सम्पदा के लिए यज्ञ करते हैं। अग्नि की किरणें सब ओर जाती हैं; उनका मुख सब दिशाओं में है और वे सबको घेरे हुए हैं। अन्तिम चित्र: जैसे नाव से नदी पार कराते हैं, वैसे ही हमें शत्रुओं के पार कल्याण तक पहुँचाओ।
अप॑ न॒ः शोशु॑चद॒घमग्ने॑ शुशु॒ग्ध्या र॒यिम् ।
अप॑ न॒ः शोशु॑चद॒घम्
apa naḥ śośucadaghamagne śuśugdhyā rayim |
apa naḥ śośucadagham
सु॒क्षे॒त्रि॒या सु॑गातु॒या व॑सू॒या च॑ यजामहे ।
अप॑ न॒ः शोशु॑चद॒घम्
sukṣetriyā sugātuyā vasūyā ca yajāmahe |
apa naḥ śośucadagham
प्र यद्भन्दि॑ष्ठ एषां॒ प्रास्माका॑सश्च सू॒रय॑ः ।
अप॑ न॒ः शोशु॑चद॒घम्
pra yadbhandiṣṭha eṣāṃ prāsmākāsaśca sūrayaḥ |
apa naḥ śośucadagham
प्र यत्ते॑ अग्ने सू॒रयो॒ जाये॑महि॒ प्र ते॑ व॒यम् ।
अप॑ न॒ः शोशु॑चद॒घम्
pra yatte agne sūrayo jāyemahi pra te vayam |
apa naḥ śośucadagham
प्र यद॒ग्नेः सह॑स्वतो वि॒श्वतो॒ यन्ति॑ भा॒नव॑ः ।
अप॑ न॒ः शोशु॑चद॒घम्
pra yadagneḥ sahasvato viśvato yanti bhānavaḥ |
apa naḥ śośucadagham
त्वं हि वि॑श्वतोमुख वि॒श्वत॑ः परि॒भूरसि॑ ।
अप॑ न॒ः शोशु॑चद॒घम्
tvaṃ hi viśvatomukha viśvataḥ paribhūrasi |
apa naḥ śośucadagham
द्विषो॑ नो विश्वतोमु॒खाति॑ ना॒वेव॑ पारय ।
अप॑ न॒ः शोशु॑चद॒घम्
dviṣo no viśvatomukhāti nāveva pāraya |
apa naḥ śośucadagham
स न॒ः सिन्धु॑मिव ना॒वयाति॑ पर्षा स्व॒स्तये॑ ।
अप॑ न॒ः शोशु॑चद॒घम्
sa naḥ sindhumiva nāvayāti parṣā svastaye |
apa naḥ śośucadagham
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