प्रथम मण्डल

सूक्त 20: कौशल से यज्ञभाग पाने वाले ऋभुगण

ऋषि: मेधातिथिः काण्वः · देवता: ऋभवः · छन्द: गायत्री

8 श्लोक · 20 में से 191

इस अध्याय में क्या होता है

कौशल से यज्ञभाग पाने वाले ऋभुगण

रत्नों से सबसे भरी यह स्तुति ज्ञानियों ने ऋभुओं के दिव्य वंश के लिए रची है। मेधातिथि काण्व के ये गायत्री मन्त्र उन कुशल शिल्पी ऋभुओं के कर्म कहते हैं जो देवत्व को प्राप्त हुए। उन्होंने मन से इन्द्र के उन हरि अश्वों को गढ़ा जो वचन से जुड़ जाते हैं। नासत्यों के लिए सर्वत्र चलने वाला सुखद रथ बनाया और अमृत देने वाली गाय रची। सत्यवादी और सरल ऋभुओं ने अपने वृद्ध माता पिता को फिर युवा बना दिया। त्वष्टा का बनाया एक नया चमस उन्होंने चार कर दिया। अपने सुकर्म से उन्होंने देवों में यज्ञ का भाग पाया; अब उनसे तीन गुना सात रत्न माँगे गये हैं।

20.1

अ॒यं दे॒वाय॒ जन्म॑ने॒ स्तोमो॒ विप्रे॑भिरास॒या ।
अका॑रि रत्न॒धात॑मः

ayaṃ devāya janmane stomo viprebhirāsayā |
akāri ratnadhātamaḥ

20.2

य इन्द्रा॑य वचो॒युजा॑ तत॒क्षुर्मन॑सा॒ हरी॑ ।
शमी॑भिर्य॒ज्ञमा॑शत

ya indrāya vacoyujā tatakṣurmanasā harī |
śamībhiryajñamāśata

20.3

तक्ष॒न्नास॑त्याभ्यां॒ परि॑ज्मानं सु॒खं रथ॑म् ।
तक्ष॑न्धे॒नुं स॑ब॒र्दुघा॑म्

takṣannāsatyābhyāṃ parijmānaṃ sukhaṃ ratham |
takṣandhenuṃ sabardughām

20.4

युवा॑ना पि॒तरा॒ पुन॑ः स॒त्यम॑न्त्रा ऋजू॒यव॑ः ।
ऋ॒भवो॑ वि॒ष्ट्य॑क्रत

yuvānā pitarā punaḥ satyamantrā ṛjūyavaḥ |
ṛbhavo viṣṭyakrata

20.5

सं वो॒ मदा॑सो अग्म॒तेन्द्रे॑ण च म॒रुत्व॑ता ।
आ॒दि॒त्येभि॑श्च॒ राज॑भिः

saṃ vo madāso agmatendreṇa ca marutvatā |
ādityebhiśca rājabhiḥ

20.6

उ॒त त्यं च॑म॒सं नवं॒ त्वष्टु॑र्दे॒वस्य॒ निष्कृ॑तम् ।
अक॑र्त च॒तुर॒ः पुन॑ः

uta tyaṃ camasaṃ navaṃ tvaṣṭurdevasya niṣkṛtam |
akarta caturaḥ punaḥ

20.7

ते नो॒ रत्ना॑नि धत्तन॒ त्रिरा साप्ता॑नि सुन्व॒ते ।
एक॑मेकं सुश॒स्तिभि॑ः

te no ratnāni dhattana trirā sāptāni sunvate |
ekamekaṃ suśastibhiḥ

20.8

अधा॑रयन्त॒ वह्न॒योऽभ॑जन्त सुकृ॒त्यया॑ ।
भा॒गं दे॒वेषु॑ य॒ज्ञिय॑म्

adhārayanta vahnayo'bhajanta sukṛtyayā |
bhāgaṃ deveṣu yajñiyam

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