प्रथम मण्डल

सूक्त 179: लोपामुद्रा और अगस्त्य: तप और गृहस्थ

ऋषि: १-२ लोपामुद्रा, ३-४ अगस्त्यो मैत्रावरुणिः, ५-६ अगस्त्यशिष्यो ब्रह्मचारी · देवता: रतिः · छन्द: त्रिष्टुप्, ५ बृहती

6 श्लोक · 179 में से 191

इस अध्याय में क्या होता है

लोपामुद्रा और अगस्त्य: तप और गृहस्थ

पति-पत्नी का यह संवाद है; अनुक्रमणी इसका देवता रति बताती है, छन्द त्रिष्टुप् और एक मन्त्र बृहती। पहले लोपामुद्रा कहती हैं: बहुत से शरद मैंने तप में बिताए, और बुढ़ापा शोभा घटाता है; पुराने सत्यपालक ऋषि भी अपनी पत्नियों से दूर नहीं रहे। अगस्त्य उत्तर देते हैं कि हमारा तप व्यर्थ नहीं गया, और हम दोनों मिलकर दोनों लक्ष्य पाएँगे। उनमें कामना जागती है और लोपामुद्रा उन्हें अपनी ओर खींचती हैं। फिर एक शिष्य सोम से दोष की क्षमा माँगता है, क्योंकि मनुष्य की कामनाएँ बहुत हैं। अन्त में कहा गया है कि सन्तान चाहते अगस्त्य ने दोनों मार्ग निभाए और उनकी कामनाएँ सत्य हुईं।

179.1

पू॒र्वीर॒हं श॒रद॑ः शश्रमा॒णा दो॒षा वस्तो॑रु॒षसो॑ ज॒रय॑न्तीः ।
मि॒नाति॒ श्रियं॑ जरि॒मा त॒नूना॒मप्यू॒ नु पत्नी॒र्वृष॑णो जगम्युः

pūrvīrahaṃ śaradaḥ śaśramāṇā doṣā vastoruṣaso jarayantīḥ |
mināti śriyaṃ jarimā tanūnāmapyū nu patnīrvṛṣaṇo jagamyuḥ

179.2

ये चि॒द्धि पूर्व॑ ऋत॒साप॒ आस॑न्सा॒कं दे॒वेभि॒रव॑दन्नृ॒तानि॑ ।
ते चि॒दवा॑सुर्न॒ह्यन्त॑मा॒पुः समू॒ नु पत्नी॒र्वृष॑भिर्जगम्युः

ye ciddhi pūrva ṛtasāpa āsansākaṃ devebhiravadannṛtāni |
te cidavāsurnahyantamāpuḥ samū nu patnīrvṛṣabhirjagamyuḥ

179.3

न मृषा॑ श्रा॒न्तं यदव॑न्ति दे॒वा विश्वा॒ इत्स्पृधो॑ अ॒भ्य॑श्नवाव ।
जया॒वेदत्र॑ श॒तनी॑थमा॒जिं यत्स॒म्यञ्चा॑ मिथु॒नाव॒भ्यजा॑व

na mṛṣā śrāntaṃ yadavanti devā viśvā itspṛdho abhyaśnavāva |
jayāvedatra śatanīthamājiṃ yatsamyañcā mithunāvabhyajāva

179.4

न॒दस्य॑ मा रुध॒तः काम॒ आग॑न्नि॒त आजा॑तो अ॒मुत॒ः कुत॑श्चित् ।
लोपा॑मुद्रा॒ वृष॑णं॒ नी रि॑णाति॒ धीर॒मधी॑रा धयति श्व॒सन्त॑म्

nadasya mā rudhataḥ kāma āgannita ājāto amutaḥ kutaścit |
lopāmudrā vṛṣaṇaṃ nī riṇāti dhīramadhīrā dhayati śvasantam

179.5

इ॒मं नु सोम॒मन्ति॑तो हृ॒त्सु पी॒तमुप॑ ब्रुवे ।
यत्सी॒माग॑श्चकृ॒मा तत्सु मृ॑ळतु पुलु॒कामो॒ हि मर्त्य॑ः

imaṃ nu somamantito hṛtsu pītamupa bruve |
yatsīmāgaścakṛmā tatsu mṛḻatu pulukāmo hi martyaḥ

179.6

अ॒गस्त्य॒ः खन॑मानः ख॒नित्रै॑ः प्र॒जामप॑त्यं॒ बल॑मि॒च्छमा॑नः ।
उ॒भौ वर्णा॒वृषि॑रु॒ग्रः पु॑पोष स॒त्या दे॒वेष्वा॒शिषो॑ जगाम

agastyaḥ khanamānaḥ khanitraiḥ prajāmapatyaṃ balamicchamānaḥ |
ubhau varṇāvṛṣirugraḥ pupoṣa satyā deveṣvāśiṣo jagāma

पाठ का स्रोत: Wikisource · CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription of a public-domain text)