उत्तरकाण्ड

अध्याय 96: वही देह धन्य जो राम को भजे

7 श्लोक · 96 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

वही देह धन्य जो राम को भजे

काकभुशुण्डि आगे कहते हैं। जीव का सच्चा स्वार्थ यही है कि मन, कर्म और वचन से राम के चरणों में प्रेम हो। वही शरीर धन्य है जिससे रघुवीर का भजन हो; राम से विमुख ब्रह्मा जैसी देह भी नहीं सराही जाती। इस काग-देह में भक्ति उपजी, इसलिए यह प्रिय है, और इच्छामृत्यु होते हुए भी वे इसे नहीं छोड़ते, क्योंकि वेद कहते हैं कि शरीर बिना भजन नहीं होता। पहले मोह ने उन्हें बहुत बिगाड़ा। अनगिनत जन्मों और योनियों में योग, जप, तप और दान किए, पर किसी से इतने सुखी न हुए जितने अब हैं। शिव की कृपा से सब जन्म याद हैं। वे पहले जन्म से आरम्भ करते हैं: पिछले कल्प का अधर्म-भरा कलियुग।

96.1

स्वारथ साँच जीव कहँ एहा । मन क्रम बचन राम-पद नेहा ॥
सोइ पावन सोइ सुभग सरीरा । जो तनु पाइ भजिअ रघुबीरा ॥

svāratha sām̐ca jīva kaham̐ ehā | mana krama bacana rāma-pada nehā ||
soi pāvana soi subhaga sarīrā | jo tanu pāi bhajia raghubīrā ||

96.2

राम बिमुख लहि बिधि सम देही । कबि कोबिद न प्रसंसहिँ तेही ॥
राम भगति एहिं तन उर जामी । तातें मोहि परम प्रिय स्वामी ॥

rāma bimukha lahi bidhi sama dehī | kabi kobida na prasaṃsahim̐ tehī ||
rāma bhagati ehiṃ tana ura jāmī | tāteṃ mohi parama priya svāmī ||

96.3

तजउँ न तन निज इच्छा मरना । तन बिनु बेद भजन नहिँ बरना ॥
प्रथम मोहँ मोहि बहुत बिगोवा । राम बिमुख सुख कबहुँ न सोवा ॥

tajaum̐ na tana nija icchā maranā | tana binu beda bhajana nahim̐ baranā ||
prathama moham̐ mohi bahuta bigovā | rāma bimukha sukha kabahum̐ na sovā ||

96.4

नाना जनम करम पुनि नाना । किये जोग जप तप मख दाना ॥
कवन जोनि जनमेउँ जहँ नाहीं । मैं खगेस भ्रमि भ्रमि जग माहीं ॥

nānā janama karama puni nānā | kiye joga japa tapa makha dānā ||
kavana joni janameum̐ jaham̐ nāhīṃ | maiṃ khagesa bhrami bhrami jaga māhīṃ ||

96.5

देखेउँ करि सब करम गोसाँई । सुखी न भयउँ अबहिँ की नाँई ॥
सुधि मोहि नाथ जनम बहु केरी । सिव प्रसाद मति मोहँ न घेरी ॥

dekheum̐ kari saba karama gosām̐ī | sukhī na bhayaum̐ abahim̐ kī nām̐ī ||
sudhi mohi nātha janama bahu kerī | siva prasāda mati moham̐ na gherī ||

दो॰ 96 (क)दोहा

प्रथम जनम के चरित अब, कहउँ सुनहु बिहगेस ।
सुनि प्रभु-पद रति उपजइ, जातें मिटहिँ कलेस ॥

prathama janama ke carita aba, kahaum̐ sunahu bihagesa |
suni prabhu-pada rati upajai, jāteṃ miṭahim̐ kalesa ||

दो॰ 96 (ख)दोहा

पूरुब कल्प एक प्रभु, जुग कलिजुग मल-मूल ।
नर अरु नारि अधर्म रत, सकल निगम प्रतिकूल ॥

pūruba kalpa eka prabhu, juga kalijuga mala-mūla |
nara aru nāri adharma rata, sakala nigama pratikūla ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0