जो माया सब जगहि नचावा । जासु चरित लखि काहु न पावा ॥
सोइ प्रभु भ्रू बिलास खगराजा । नाच नटी इव सहित समाजा ॥
jo māyā saba jagahi nacāvā | jāsu carita lakhi kāhu na pāvā ||
soi prabhu bhrū bilāsa khagarājā | nāca naṭī iva sahita samājā ||
6 श्लोक · 72 में से 130
भुशुण्डि गरुड़ से कहते हैं, जो माया सारे जगत को नचाती है और जिसका चरित कोई नहीं जान पाया, वही हे खगराज, प्रभु की भौंह के इशारे पर अपने समाज सहित नटी की तरह नाचती है। वही प्रभु श्रीराम सच्चिदानन्दघन हैं, अजन्मा, अनन्त, अमोघ शक्ति वाले भगवान। वे गुणों से परे, वाणी और इन्द्रियों से अतीत, निर्दोष, निराकार, नित्य, प्रकृति से परे, सबके हृदय में बसने वाले, इच्छारहित, निर्मल, अविनाशी ब्रह्म हैं। उनमें मोह का कोई कारण नहीं; क्या सूर्य के सामने अन्धकार जा सकता है? भक्तों के लिए भगवान श्रीराम ने राजा का शरीर धरा और साधारण मनुष्य के अनुरूप परम पावन चरित किए, जैसे कोई नट अनेक वेष धरकर हर भाव दिखाता है पर स्वयं वह नहीं बन जाता।
जो माया सब जगहि नचावा । जासु चरित लखि काहु न पावा ॥
सोइ प्रभु भ्रू बिलास खगराजा । नाच नटी इव सहित समाजा ॥
jo māyā saba jagahi nacāvā | jāsu carita lakhi kāhu na pāvā ||
soi prabhu bhrū bilāsa khagarājā | nāca naṭī iva sahita samājā ||
सोइ सच्चिदानन्द घन रामा । अज विज्ञान रूपो बल धामा ॥
व्यापक ब्याप्य अखंड अनन्ता । अखिल अमोघसक्ति भगवन्ता ॥
soi saccidānanda ghana rāmā | aja vijñāna rūpo bala dhāmā ||
vyāpaka byāpya akhaṃḍa anantā | akhila amoghasakti bhagavantā ||
अगुन अदभ्र गिरा गोतीता । सबदरसी अनवद्य अजीता ॥
निर्मम निराकार निरमोहा । नित्य निरञ्जन सुख सन्दोहा ॥
aguna adabhra girā gotītā | sabadarasī anavadya ajītā ||
nirmama nirākāra niramohā | nitya nirañjana sukha sandohā ||
प्रकृति पार प्रभु सब उर बासी । ब्रह्म निरीह बिरज अबिनासी ॥
इहाँ मोह कर कारन नाहीं । रबि सनमुख तम कबहुँ कि जाहीं ॥
prakṛti pāra prabhu saba ura bāsī | brahma nirīha biraja abināsī ||
ihām̐ moha kara kārana nāhīṃ | rabi sanamukha tama kabahum̐ ki jāhīṃ ||
भगत हेतु भगवान प्रभु, राम धरेउ तनु भूप ।
किये चरित पावन परम, प्राकृत नर अनुरूप ॥
bhagata hetu bhagavāna prabhu, rāma dhareu tanu bhūpa |
kiye carita pāvana parama, prākṛta nara anurūpa ||
जथा अनेक बेष धरि, नृत्य करइ नट कोइ ।
सोइ सोइ भाव देखावइ, आपुन होइ न सोइ ॥
jathā aneka beṣa dhari, nṛtya karai naṭa koi |
soi soi bhāva dekhāvai, āpuna hoi na soi ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0