असि रघुपति लीला उरगारी । दनुज बिमोहनि जन सुखकारी ॥
जे मति मलिन बिषय बस कामी । प्रभु मोह धरहिँ इमि स्वामी ॥
asi raghupati līlā uragārī | danuja bimohani jana sukhakārī ||
je mati malina biṣaya basa kāmī | prabhu moha dharahim̐ imi svāmī ||
7 श्लोक · 73 में से 130
भुशुण्डि गरुड़ से कहते हैं, रघुपति की लीला ऐसी है: वह दानवों को मोहित करती है और भक्तों को सुख देती है। जिनकी बुद्धि मलिन है और जो विषयों के वश कामी हैं, वे प्रभु पर मोह का आरोप करते हैं। जिसे दिशा-भ्रम हो, वह कहता है सूर्य पश्चिम में उगा। नाव पर बैठा मनुष्य तट को चलता और स्वयं को अचल समझता है। हरि के विषय में ऐसा ही मोह है; अज्ञान का प्रसंग उन्हें सपने में भी नहीं छूता। माया से ढके मन्दबुद्धि लोग हठ से संशय करते हैं और अपना अज्ञान राम पर डालते हैं। काम और लोभ में डूबे वे अन्धकार के कुएँ में पड़े हैं। निर्गुण रूप सुलभ है, सगुण को कोई नहीं जानता; उनके चरितों से मुनि भी भ्रमित होते हैं।
असि रघुपति लीला उरगारी । दनुज बिमोहनि जन सुखकारी ॥
जे मति मलिन बिषय बस कामी । प्रभु मोह धरहिँ इमि स्वामी ॥
asi raghupati līlā uragārī | danuja bimohani jana sukhakārī ||
je mati malina biṣaya basa kāmī | prabhu moha dharahim̐ imi svāmī ||
नयन-दोष जा कहँ जब होई । पीत बरन ससि कहुँ कह कह साई ॥
जब जेहि दिसि-भ्रम होइ खगेसा । सो कह पच्छिम उयउ दिनेसा ॥
nayana-doṣa jā kaham̐ jaba hoī | pīta barana sasi kahum̐ kaha kaha sāī ||
jaba jehi disi-bhrama hoi khagesā | so kaha pacchima uyau dinesā ||
नौकारूढ़ चलत जग देखा । अचल मोह बस आपुहि लेखा ॥
बालक भ्रमहिं न भ्रमहिं गृहादीं । कहहिँ परस्पर मिथ्याबादी ॥
naukārūr̤ha calata jaga dekhā | acala moha basa āpuhi lekhā ||
bālaka bhramahiṃ na bhramahiṃ gṛhādīṃ | kahahim̐ paraspara mithyābādī ||
हरि विषइक अस मोह बिहङ्गा । सपनेहुँ नहिं अज्ञान प्रसङ्गा ॥
मायाबस मतिमन्द अभागी । हृदयँ जमनिका बहुबिधि लागी ॥
hari viṣaika asa moha bihaṅgā | sapanehum̐ nahiṃ ajñāna prasaṅgā ||
māyābasa matimanda abhāgī | hṛdayam̐ jamanikā bahubidhi lāgī ||
ते सठ हठ बस संसय करहीं । निज अज्ञान राम पर धरहीँ ॥
te saṭha haṭha basa saṃsaya karahīṃ | nija ajñāna rāma para dharahīm̐ ||
काम क्रोध मद लोभ रत, गृहासक्त दुखरूप ।
ते किमि जानहिँ रघुपतिहि, मूढ़ परे तम कूप ॥
kāma krodha mada lobha rata, gṛhāsakta dukharūpa |
te kimi jānahim̐ raghupatihi, mūr̤ha pare tama kūpa ||
निर्गुन रूप सुलभ अति, सगुन जान नहिँ कोइ ।
सुगम अगम नाना चरित, सुनि मुनि मन भ्रम होइ ॥
nirguna rūpa sulabha ati, saguna jāna nahim̐ koi |
sugama agama nānā carita, suni muni mana bhrama hoi ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0