बोलेउ काकभसुंड बहोरी । नभग नाथ पर प्रीति न थोरी ॥
सब विधि नाथ पूज्य तुम्ह मेरे । कृपापात्र रघुनायक केरे ॥
boleu kākabhasuṃḍa bahorī | nabhaga nātha para prīti na thorī ||
saba vidhi nātha pūjya tumha mere | kṛpāpātra raghunāyaka kere ||
6 श्लोक · 70 में से 130
काकभुशुण्डि पक्षिराज पर बड़ी प्रीति रखकर बोले: हे नाथ, आप सब प्रकार से मेरे पूज्य हैं और रघुनायक के कृपापात्र। मोह के बहाने आपको भेजकर रघुपति ने मुझे बड़ाई दी है। हे गोसाईं, आपने जो अपना मोह कहा, उसमें कोई आश्चर्य नहीं। नारद, शिव, ब्रह्मा, सनकादि, जो आत्मज्ञानी मुनियों में श्रेष्ठ हैं, मोह ने किसे अन्धा नहीं किया? जगत में ऐसा कौन है जिसे काम ने नहीं नचाया? तृष्णा ने किसे बावला नहीं किया, क्रोध ने किसका हृदय नहीं जलाया? ज्ञानियों और विद्वानों में लोभ ने किसकी विडम्बना नहीं की? लक्ष्मी के मद ने किसे टेढ़ा नहीं किया, प्रभुता ने किसे बहरा नहीं किया, और मृगनयनी के नेत्र-बाण किसे नहीं लगे?
बोलेउ काकभसुंड बहोरी । नभग नाथ पर प्रीति न थोरी ॥
सब विधि नाथ पूज्य तुम्ह मेरे । कृपापात्र रघुनायक केरे ॥
boleu kākabhasuṃḍa bahorī | nabhaga nātha para prīti na thorī ||
saba vidhi nātha pūjya tumha mere | kṛpāpātra raghunāyaka kere ||
तुम्हहि न संसय मोह न माया । मो पर नाथ कीन्ह तुम्ह दाया ॥
पठइ मोह मिस खगपति तोही । रघुपति दीन्हि बड़ाई मोही ॥
tumhahi na saṃsaya moha na māyā | mo para nātha kīnha tumha dāyā ||
paṭhai moha misa khagapati tohī | raghupati dīnhi bar̤āī mohī ||
तुम्ह निज मोह कही खग साईं । सो नहिँ कछु आचरज गोसाँई ॥
नारद मय बिरञ्चि सनकादी । जे मुनिनायक आतमबादी ॥
tumha nija moha kahī khaga sāīṃ | so nahim̐ kachu ācaraja gosām̐ī ||
nārada maya birañci sanakādī | je munināyaka ātamabādī ||
मोह न अन्ध कीन्ह केहि केही । को जग काम नचाव न जेही ॥
तृस्नाँ केहि न कीन्ह बौराहा । केहि कर हृदय क्रोध नहिं दाहा ॥
moha na andha kīnha kehi kehī | ko jaga kāma nacāva na jehī ||
tṛsnām̐ kehi na kīnha baurāhā | kehi kara hṛdaya krodha nahiṃ dāhā ||
ज्ञानी तापस सूर कवि, कोबिद गुन आगार ।
केहि कै लोभ बिडम्बना, कीन्हि न एहिं संसार ॥
jñānī tāpasa sūra kavi, kobida guna āgāra |
kehi kai lobha biḍambanā, kīnhi na ehiṃ saṃsāra ||
श्री मद बक्र न कीन्ह केहि, प्रभुता बधिर न काहि ।
मृगलोचनि के नयन सर, को अस लाग न जाहि ॥
śrī mada bakra na kīnha kehi, prabhutā badhira na kāhi |
mṛgalocani ke nayana sara, ko asa lāga na jāhi ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0