देखि चरित अति नर अनुसारी । भयउ हृदयँ मम संसय भारी ॥
सोइ भ्रम अब हित करि मैं माना । कीन्ह अनुग्रह कृपानिधाना ॥
dekhi carita ati nara anusārī | bhayau hṛdayam̐ mama saṃsaya bhārī ||
soi bhrama aba hita kari maiṃ mānā | kīnha anugraha kṛpānidhānā ||
6 श्लोक · 69 में से 130
गरुड़ भुशुण्डि से आगे कहते हैं: मनुष्य जैसे चरित देखकर मेरे हृदय में भारी संशय हुआ। अब उसी भ्रम को मैं अपना हित मानता हूँ, कृपानिधान ने मुझ पर अनुग्रह किया। जो कड़ी धूप से व्याकुल होता है, वही पेड़ की छाया का सुख जानता है। यदि मुझे इतना मोह न होता, तो तात, आपसे कैसे मिलता, और यह हरि-कथा कैसे सुनता? वेद और मुनि यही कहते हैं कि विशुद्ध सन्त उसी को मिलते हैं जिसे राम कृपा करके देखते हैं। राम-कृपा से आपके दर्शन हुए और आपके प्रसाद से सब संशय गया। पक्षिराज की विनय और प्रेम भरी वाणी सुनकर कौआ अत्यन्त हर्षित हुआ। भगवान शिव उमा से कहते हैं, सुबुद्धि, सुशील, पवित्र और कथा-रसिक श्रोता पाकर सज्जन अत्यन्त गुप्त बात भी प्रकट कर देते हैं।
देखि चरित अति नर अनुसारी । भयउ हृदयँ मम संसय भारी ॥
सोइ भ्रम अब हित करि मैं माना । कीन्ह अनुग्रह कृपानिधाना ॥
dekhi carita ati nara anusārī | bhayau hṛdayam̐ mama saṃsaya bhārī ||
soi bhrama aba hita kari maiṃ mānā | kīnha anugraha kṛpānidhānā ||
जो अति आतप व्याकुल होई । तरु छाया सुख जानइ खाई ॥
जौँ नहिं होत मोह अति मोही । मिलतेउँ तात कवन विधि तोही ॥
jo ati ātapa vyākula hoī | taru chāyā sukha jānai khāī ||
jaum̐ nahiṃ hota moha ati mohī | milateum̐ tāta kavana vidhi tohī ||
सुनतेउँ किमि हरि कथा सुहाई । अति बिचित्र बहु बिधि तुम्ह गाई ॥
निगमागम पुरान मत एहा । कहहिँ सिद्ध मुनि नहिँ सन्देहा ॥
sunateum̐ kimi hari kathā suhāī | ati bicitra bahu bidhi tumha gāī ||
nigamāgama purāna mata ehā | kahahim̐ siddha muni nahim̐ sandehā ||
सन्त बिसुद्ध मिलहिँ परि तेही । चितवहिँ राम कृपा करि जेही ॥
राम कृपाँ तव दरसन भयऊ । तव प्रसाद सब संसय गयऊ ॥
santa bisuddha milahim̐ pari tehī | citavahim̐ rāma kṛpā kari jehī ||
rāma kṛpām̐ tava darasana bhayaū | tava prasāda saba saṃsaya gayaū ||
सुनि बिहँगपति मानी, सहित बिनय अनुराग ।
पुलक गात लोचन सजल, मन हरषेउ अति काग ॥
suni biham̐gapati mānī, sahita binaya anurāga |
pulaka gāta locana sajala, mana haraṣeu ati kāga ||
स्रोता सुमति सुसील सुचि, कथा रसिक हरि दास ।
पाइ उमा अति गोप्यमपि, सज्जन करहिं प्रकास ॥
srotā sumati susīla suci, kathā rasika hari dāsa |
pāi umā ati gopyamapi, sajjana karahiṃ prakāsa ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0