उत्तरकाण्ड

अध्याय 65: भुशुण्डि का अयोध्या से अरण्य तक वर्णन

5 श्लोक · 65 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

भुशुण्डि का अयोध्या से अरण्य तक वर्णन

भगवान शिव उमा को आगे बताते हैं कि भुशुण्डि ने गरुड़ से क्या-क्या कहा। फिर राम-अभिषेक का प्रसंग, और राजा के वचन से आनन्द का भंग; पुरवासियों का विरह-विषाद; राम और लक्ष्मण का संवाद। फिर वन-गमन, केवट का प्रेम, गंगा पार कर प्रयाग में निवास; वाल्मीकि से प्रभु का मिलन, और भगवान का चित्रकूट में बसना। फिर मन्त्री का लौटना, नगर में राजा का मरण, और भरत के आगमन तथा उनके प्रेम का विस्तार से वर्णन; राजा की क्रिया करके पुरवासियों सहित भरत का प्रभु के पास जाना, रघुपति का अनेक प्रकार से समझाना, और पादुका लेकर भरत का अवधपुर लौटना। फिर भरत की रहनी, इन्द्र-पुत्र की करनी, अत्रि से भेंट, विराध-वध, शरभंग का देह-त्याग, सुतीक्ष्ण की प्रीति और अगस्त्य का सत्संग।

65.1

बहुरि राम अभिषेक प्रसङ्गा । पुनि नृप बचन बाज-रस भङ्गा ॥
पुरबासिन्ह कर बिरह बिषादा । कहेसि राम लछिमन सम्बादा ॥

bahuri rāma abhiṣeka prasaṅgā | puni nṛpa bacana bāja-rasa bhaṅgā ||
purabāsinha kara biraha biṣādā | kahesi rāma lachimana sambādā ||

65.2

विपिन गवन केवट अनुरागा । सुरसरि उतरि निवास प्रयागा ॥
बालमीक प्रभु मिलन बखाना । चित्रकूट जिमि बसे भगवाना ॥

vipina gavana kevaṭa anurāgā | surasari utari nivāsa prayāgā ||
bālamīka prabhu milana bakhānā | citrakūṭa jimi base bhagavānā ||

65.3

सचिवागवन नगर नृप मरना । भरतागवन प्रेम बहु बरना ॥
करि नृप क्रिया सङ्ग पुरबासी । मरन गये जहँ प्रभु सुख रासी ॥

sacivāgavana nagara nṛpa maranā | bharatāgavana prema bahu baranā ||
kari nṛpa kriyā saṅga purabāsī | marana gaye jaham̐ prabhu sukha rāsī ||

65.4

पुनि रघुपति बहु बिधि समुझाये । लेइ पादुका अवधपुर आये ॥
भरत रहनि सुरपति-गत करनी । प्रभु अरु अत्रि भेँट पुनि बरनी ॥

puni raghupati bahu bidhi samujhāye | lei pādukā avadhapura āye ||
bharata rahani surapati-gata karanī | prabhu aru atri bhem̐ṭa puni baranī ||

दो॰ 65दोहा

कहि बिराध बध जेहि विधि, देह तजी सरभङ्ग ।
बरनि सुतीछन प्रीति पुनि, प्रभु अगस्ति सतसङ्ग ॥

kahi birādha badha jehi vidhi, deha tajī sarabhaṅga |
barani sutīchana prīti puni, prabhu agasti satasaṅga ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0