उत्तरकाण्ड

अध्याय 64: भुशुण्डि गरुड़ को मानस सुनाने लगे

6 श्लोक · 64 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

भुशुण्डि गरुड़ को मानस सुनाने लगे

गरुड़ भुशुण्डि से कहते हैं, तात, जिस कारण आया था वह आपके दर्शन से पूरा हो गया; आपका परम पावन आश्रम देखकर मोह, संशय और अनेक भ्रम मिट गए। अब अत्यन्त पवित्र श्रीराम-कथा आदर से सुनाइए। गरुड़ की विनम्र, सरल, प्रेम भरी और पवित्र वाणी सुनकर कौए के मन में बड़ा उत्साह हुआ और वह रघुपति की गुण-गाथा कहने लगा। भगवान शिव भवानी को क्रम बताते हैं। पहले भुशुण्डि ने अत्यन्त प्रेम से रामचरित-सरोवर का वर्णन किया। फिर नारद का अपार मोह, फिर रावण का अवतार, फिर प्रभु के अवतार की कथा, फिर मन लगाकर शिशु-चरित। फिर उन्होंने ऋषि का आगमन और श्री रघुवीर का विवाह कहा।

64.1

सुनहु तात जेहि कारन आयउँ । सो सब भयउ दरस तव पायउँ ॥
देखि परम पावन तव आश्रम । गयउ मोह संसय नाना भ्रम ॥

sunahu tāta jehi kārana āyaum̐ | so saba bhayau darasa tava pāyaum̐ ||
dekhi parama pāvana tava āśrama | gayau moha saṃsaya nānā bhrama ||

64.2

अब श्रीराम कथा अति पावनि । सदा सुखद दुख पुञ्ज नसावनि ॥
सादर तात सुनावहु मोही । बार बार बिनवउँ प्रभु तोही ॥

aba śrīrāma kathā ati pāvani | sadā sukhada dukha puñja nasāvani ||
sādara tāta sunāvahu mohī | bāra bāra binavaum̐ prabhu tohī ||

64.3

सुनत गरुड़ कै गिरा बिनीता । सरल सुप्रेम सुखद सुपुनीता ॥
भयउ तासु मन परम उछाहा । लाग कहइ रघुपति गुन गाहा ॥

sunata garur̤a kai girā binītā | sarala suprema sukhada supunītā ||
bhayau tāsu mana parama uchāhā | lāga kahai raghupati guna gāhā ||

64.4

प्रथमहिँ अति अनुराग भवानी । रामचरित-सर कहेसि बखानी ॥
पुनि नारद कर मोह अपारा । कहेसि बहुरि रावन अवतारा ॥

prathamahim̐ ati anurāga bhavānī | rāmacarita-sara kahesi bakhānī ||
puni nārada kara moha apārā | kahesi bahuri rāvana avatārā ||

64.5

प्रभु अवतार कथा पुनि गाई । तब सिसु-चरित कहेसि मन लाई ॥

prabhu avatāra kathā puni gāī | taba sisu-carita kahesi mana lāī ||

दो॰ 64दोहा

बालचरित कहिँ बिबिध विधि, मन महँ परम उछाह ।
रिषि आगमन कहेसि पुनि, श्री रघुबीर बिबाह ॥

bālacarita kahim̐ bibidha vidhi, mana maham̐ parama uchāha |
riṣi āgamana kahesi puni, śrī raghubīra bibāha ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0