उत्तरकाण्ड

अध्याय 54: सबसे दुर्लभ राम-भक्त

5 श्लोक · 54 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

सबसे दुर्लभ राम-भक्त

उमा अपना प्रश्न दुर्लभता की सीढ़ी बनाकर भगवान शिव के सामने रखती हैं। हे पुरारि, हज़ार मनुष्यों में कोई एक धर्म-व्रत धारण करता है। करोड़ धर्मशीलों में कोई एक विषयों से विमुख होकर वैराग्य में रमता है। श्रुति कहती है, करोड़ विरक्तों में कोई एक कभी सम्यक ज्ञान पाता है। करोड़ ज्ञानियों में संसार में कोई एक जीवन्मुक्त होता है। ऐसे हज़ारों में सब सुखों की खान, ब्रह्म में लीन विज्ञानी और भी दुर्लभ है। हे सुरों के स्वामी, इन सबसे दुर्लभ वह है जो मद और माया छोड़कर राम-भक्ति में रत है। ऐसी हरि-भक्ति कौए ने कैसे पाई? हे विश्वनाथ, मुझे समझाकर कहिए। और हे नाथ, यह भी बताइए कि राम-परायण, ज्ञान में रत, गुणों के धाम और धीर बुद्धि वाले को कौए का शरीर किस कारण मिला।

54.1

नर सहस्त्र महँ सुनहु पुरारी । कोउ एक होइ धर्म ब्रतधारी ॥
धर्मसील कोटिक महँ कोई । विषय बिमुख बिराग रत होई ॥

nara sahastra maham̐ sunahu purārī | kou eka hoi dharma bratadhārī ||
dharmasīla koṭika maham̐ koī | viṣaya bimukha birāga rata hoī ||

54.2

कोटि बिरक्त मध्य श्रुति कहई । सम्यक ग्यान सकृत कोउ लहई ॥
ज्ञानवन्त कोटिक महँ कोऊ । जीवनमुक्त सकृत जग सोऊ ॥

koṭi birakta madhya śruti kahaī | samyaka gyāna sakṛta kou lahaī ||
jñānavanta koṭika maham̐ koū | jīvanamukta sakṛta jaga soū ||

54.3

तिन्ह सहस्र महँ सब सुख खानी । दुर्लभ ब्रह्म-लीन विज्ञानी ॥
धर्मसील बिरक्त अरु ज्ञानी । जीवनमुक्त ब्रह्मपर प्रानी ॥

tinha sahasra maham̐ saba sukha khānī | durlabha brahma-līna vijñānī ||
dharmasīla birakta aru jñānī | jīvanamukta brahmapara prānī ||

54.4

सब तें सो दुर्लभ सुरराया । राम भगति रत गत मद माया ॥
सो हरिभगति काग किमि पाई । बिस्वनाथ मोहि कहहु बुझाई ॥

saba teṃ so durlabha surarāyā | rāma bhagati rata gata mada māyā ||
so haribhagati kāga kimi pāī | bisvanātha mohi kahahu bujhāī ||

दो॰ 54दोहा

राम परायन ग्यान रत, गुनागार मति धीर ।
नाथ कहहु केहि कारन, पायउ काक सरीर ॥

rāma parāyana gyāna rata, gunāgāra mati dhīra |
nātha kahahu kehi kārana, pāyau kāka sarīra ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0