उत्तरकाण्ड

अध्याय 48: श्रीराम के सम्मुख वसिष्ठ का निवेदन

5 श्लोक · 48 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

श्रीराम के सम्मुख वसिष्ठ का निवेदन

एक बार मुनि वसिष्ठ सुखधाम श्रीराम के पास आए। रघुनायक ने अत्यन्त आदर किया, उनके चरण धोकर चरणोदक लिया। मुनि ने हाथ जोड़कर कहा, हे कृपासिन्धु, मेरी एक विनती सुनिए। आपका आचरण देख-देखकर मेरे हृदय में अपार मोह उठता है, क्योंकि आपकी महिमा अमित है, वेद भी उसे नहीं जानते। वे स्मरण करते हैं कि पुरोहिती का कर्म अत्यन्त नीचा है, वेद, पुराण और स्मृति उसकी निन्दा करते हैं, इसलिए उन्होंने उसे लेने से मना किया था। तब ब्रह्मा ने कहा, हे पुत्र, आगे इसमें तुम्हारा लाभ ही है; परमात्मा ब्रह्म मनुष्य-रूप में रघुकुल के भूषण राजा होकर प्रकट होंगे। तब वसिष्ठ ने मन में विचारा कि योग, यज्ञ, व्रत और दान जिसके लिए किए जाते हैं, वही मिल जाएँगे; इसके समान कोई धर्म नहीं।

48.1

एक धार बसिष्ट मुनि आये । जहाँ राम सुखधाम सुहाये ॥
अति आदर रघुनायक कीन्हा । पद पखारि पादोदक लीन्हा ॥

eka dhāra basiṣṭa muni āye | jahām̐ rāma sukhadhāma suhāye ||
ati ādara raghunāyaka kīnhā | pada pakhāri pādodaka līnhā ||

48.2

राम सुनहु मुनि कह कर जोरी । कृपासिन्धु बिनती कछु मोरी ॥
देखि देखि आचरन तुम्हारा । होत मोह मम हृदयँ अपारा ॥

rāma sunahu muni kaha kara jorī | kṛpāsindhu binatī kachu morī ||
dekhi dekhi ācarana tumhārā | hota moha mama hṛdayam̐ apārā ||

48.3

महिमा अमित बेद नहिं जाना । मैं केहि भाँति कहउँ भगवाना ॥
उपरोहित्य-कर्म अति मन्दा । बेद पुरान सुमृति कर निन्दा ॥

mahimā amita beda nahiṃ jānā | maiṃ kehi bhām̐ti kahaum̐ bhagavānā ||
uparohitya-karma ati mandā | beda purāna sumṛti kara nindā ||

48.4

जब न लेउँ मैं तब विधि मोही । कहा लाभ आगें सुत तोही ॥
परमातमा ब्रह्म नर रूपा । होइहि रघुकुल-भूषन भूपा ॥

jaba na leum̐ maiṃ taba vidhi mohī | kahā lābha āgeṃ suta tohī ||
paramātamā brahma nara rūpā | hoihi raghukula-bhūṣana bhūpā ||

दो॰ 48दोहा

तब मैं हृदयँ, विचारा, जोग जज्ञ ब्रत दान ।
जा कहुँ करिअ सो पैहउँ, धर्म न एहि सम आन ॥

taba maiṃ hṛdayam̐, vicārā, joga jajña brata dāna |
jā kahum̐ karia so paihaum̐, dharma na ehi sama āna ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0