उत्तरकाण्ड

अध्याय 47: पुरवासी श्रीराम के चरणों में

5 श्लोक · 47 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

पुरवासी श्रीराम के चरणों में

श्रीराम के अमृत-समान वचन सुनकर सब पुरवासियों ने कृपाधाम के चरण पकड़ लिए। वे बोले, आप हमारे माता, पिता, गुरु और भाई हैं, प्राणों से भी प्यारे। तन, धन, घर, सब प्रकार से आप ही हमारा हित करते हैं। ऐसी सीख आपके सिवा कोई नहीं देता; माता-पिता भी स्वार्थ में लगे रहते हैं। युगों से बिना कारण जगत का उपकार करने वाले आप और आपके सेवक ही हैं; संसार में बाकी सब स्वार्थ के मित्र हैं। प्रेम में भीगे ये वचन सुनकर रघुनाथ हर्षित हुए, और आज्ञा पाकर सब प्रभु की बातें कहते हुए घर गए। भगवान शिव उमा से कहते हैं, अवध के नर-नारी कृतार्थ हैं, जहाँ सच्चिदानन्दघन ब्रह्म स्वयं राजा हैं।

47.1

सुनत सुधा सम बचन राम के । गहे सबनि पद कृपा-धाम के ॥
जननि जनक गुरु बन्धु हमारे । कृपा निधान प्रान ते प्यारे ॥

sunata sudhā sama bacana rāma ke | gahe sabani pada kṛpā-dhāma ke ||
janani janaka guru bandhu hamāre | kṛpā nidhāna prāna te pyāre ||

47.2

तन धन धाम राम हितकारी । सब विधि तुम्ह प्रनतारति हारी ॥
अस सिख तुम्ह बिनु देइ न कोऊ । मातु पिता स्वारथ रत ओऊ ॥

tana dhana dhāma rāma hitakārī | saba vidhi tumha pranatārati hārī ||
asa sikha tumha binu dei na koū | mātu pitā svāratha rata oū ||

47.3

हेतु रहित जग जुग उपकारी । तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी ॥
स्वारथ मीत सकल जग माहीं । सपनेहुँ प्रभु परमारथ नाहीं ॥

hetu rahita jaga juga upakārī | tumha tumhāra sevaka asurārī ||
svāratha mīta sakala jaga māhīṃ | sapanehum̐ prabhu paramāratha nāhīṃ ||

47.4

सब के बचन प्रेम रस साने । सुनि रघुनाथ हृदयँ हरषाने ॥
निज निज गृह गये आयसु पाई । बरनत प्रभु बतकही सुहाई ॥

saba ke bacana prema rasa sāne | suni raghunātha hṛdayam̐ haraṣāne ||
nija nija gṛha gaye āyasu pāī | baranata prabhu batakahī suhāī ||

दो॰ 47दोहा

उमा अवधवासी नर, नारि कृतारथ रूप ।
ब्रह्म सच्चिदानन्द घन, रघुनायक जहँ भूप ॥

umā avadhavāsī nara, nāri kṛtāratha rūpa |
brahma saccidānanda ghana, raghunāyaka jaham̐ bhūpa ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0