उत्तरकाण्ड

अध्याय 42: नारद ब्रह्मलोक में चरित सुनाते हैं

5 श्लोक · 42 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

नारद ब्रह्मलोक में चरित सुनाते हैं

श्रीमुख के वचन सुनकर सब भाई ऐसे हर्षित होते हैं कि प्रेम हृदय में नहीं समाता, और वे बार-बार विनती करते हैं; हनुमान के हृदय में अपार हर्ष है। फिर रघुपति अपने भवन जाते हैं, और इसी प्रकार नित नई लीला करते हैं। नारद मुनि बार-बार आते हैं और श्रीराम के पावन चरित गाते हैं। मुनि नित नए चरित देखकर ब्रह्मलोक जाते हैं और सब कथा सुनाते हैं। सुनकर ब्रह्मा अत्यन्त सुख मानते हैं और कहते हैं, तात, बार-बार गुणगान करो। सनकादि नारद की सराहना करते हैं; यद्यपि वे ब्रह्म में लीन मुनि हैं, गुणगान सुनकर समाधि भूल जाते हैं और आदर से सुनते हैं, क्योंकि वे परम अधिकारी हैं। जीवन्मुक्त और ब्रह्मनिष्ठ भी ध्यान छोड़कर ये चरित सुनते हैं। जिन्हें हरिकथा में प्रीति नहीं, उनके हृदय पत्थर हैं।

42.1

श्रीमुख बचन सुनत सब भाई । हरषे प्रेम न हृदयँ समाई ॥
करहिँ बिनय अति बार धारा । हनूमान हियँ हरष अपारा ॥

śrīmukha bacana sunata saba bhāī | haraṣe prema na hṛdayam̐ samāī ||
karahim̐ binaya ati bāra dhārā | hanūmāna hiyam̐ haraṣa apārā ||

42.2

पुनि रघुपति निज मन्दिर गये । एहि बिधि चरित करत नित नये ॥
बार बार नारद मुनि आवहिँ । चरित पुनीत राम के गावहिं ॥

puni raghupati nija mandira gaye | ehi bidhi carita karata nita naye ||
bāra bāra nārada muni āvahim̐ | carita punīta rāma ke gāvahiṃ ||

42.3

नित नव चरित देखि मुनि जाहीँ । ब्रह्मलोक सब कथा कहाहीं ॥
सुनि बिरञ्चि अतिसय सुख मानहिँ । पुनि पुनि तात करहु गुन गानहिं ॥

nita nava carita dekhi muni jāhīm̐ | brahmaloka saba kathā kahāhīṃ ||
suni birañci atisaya sukha mānahim̐ | puni puni tāta karahu guna gānahiṃ ||

42.4

सनकादिक नारदहि सराहहिँ । जद्यपि ब्रह्म-निरत मुनि आहहिँ ॥
सुनि गुन गान समाधि बिसारी । सादर सुनहिँ परम अधिकारी ॥

sanakādika nāradahi sarāhahim̐ | jadyapi brahma-nirata muni āhahim̐ ||
suni guna gāna samādhi bisārī | sādara sunahim̐ parama adhikārī ||

दो॰ 42दोहा

जीवनमुक्त ब्रह्मपर, चरित सुनहिँ तजि ध्यान ।
जे हरि कथाँ न करहिं रति, तिन्ह के हिय पाषान ॥

jīvanamukta brahmapara, carita sunahim̐ taji dhyāna |
je hari kathām̐ na karahiṃ rati, tinha ke hiya pāṣāna ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0