उत्तरकाण्ड

अध्याय 28: वाटिकाएँ, पक्षी और बाज़ार

6 श्लोक · 28 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

वाटिकाएँ, पक्षी और बाज़ार

सबने फूलों की वाटिकाएँ लगाई हैं, जिनकी लताएँ मानो सदा वसन्त में फूलती हैं, भौंरे गूँजते हैं और सुगन्धित पवन बहता है। बालकों ने पक्षी पाले हैं; मोर, हंस और कबूतर छतों पर बैठकर अपनी परछाईं देखते, कूजते और नाचते हैं। बालक तोते-मैना को पढ़ाते हैं: कहो राम, रघुपति, जनों के पालक। बाज़ार का वर्णन नहीं हो सकता; वहाँ वस्तुएँ बिना मूल्य मिलती हैं। जहाँ लक्ष्मीपति राजा हों, वहाँ की सम्पदा कैसे गाई जाए? व्यापारी और सराफ मानो अनेक कुबेर बनकर बैठे हैं, और बालक-बूढ़े सब सुखी और सदाचारी हैं। उत्तर में निर्मल, गहरी सरयू बहती है, जिसके घाट सुन्दर बँधे हैं और किनारे पर कीचड़ नहीं।

28.1

सुमन-बाटिका सबहिँ लगाई । विविध भाँति करि जतन बनाई ॥
लता ललित बहु जाति सुहाई । फूलहिँ सदा बसन्त कि नाई ॥

sumana-bāṭikā sabahim̐ lagāī | vividha bhām̐ti kari jatana banāī ||
latā lalita bahu jāti suhāī | phūlahim̐ sadā basanta ki nāī ||

28.2

गुंजत मधुकर मुखर मनोहर । मारुत त्रिविधि सदा बह सुन्दर ॥
नाना खग बालकन्हि जिआये । बोलत मधुर उड़ात सुहाये ॥

guṃjata madhukara mukhara manohara | māruta trividhi sadā baha sundara ||
nānā khaga bālakanhi jiāye | bolata madhura ur̤āta suhāye ||

28.3

मोर हंस सारस पारावत । भवननि पर सोभा अति पावत ॥
जहं तहँ देखहिँ निज परिछाहीं । बहु बिधि कूजहिँ नृत्य कराहीँ ॥

mora haṃsa sārasa pārāvata | bhavanani para sobhā ati pāvata ||
jahaṃ taham̐ dekhahim̐ nija parichāhīṃ | bahu bidhi kūjahim̐ nṛtya karāhīm̐ ||

28.4

सुक सारिका पढावहिं बालक । कहहु राम रघुपति जन-पालक ॥
राज दुआर सकल विधि चारू । बीथीं चौहट रूचिर बजारू ॥

suka sārikā paḍhāvahiṃ bālaka | kahahu rāma raghupati jana-pālaka ||
rāja duāra sakala vidhi cārū | bīthīṃ cauhaṭa rūcira bajārū ||

28.छं॰ 1छन्द

बाजार रुचिर न बनइ बरनत, बस्तु बिनु गथ पाइये ।
जहँ भूप रमानिवास तहँ की, सम्पदा किमि गाइये ॥
बैठे बजाज सराफ बनिक अनेक मनहुँ कुबेर ते ।
सब सुखी सब सच्चरित सुन्दर, नारि नर सिसु जरठ जे ॥

bājāra rucira na banai baranata, bastu binu gatha pāiye |
jaham̐ bhūpa ramānivāsa taham̐ kī, sampadā kimi gāiye ||
baiṭhe bajāja sarāpha banika aneka manahum̐ kubera te |
saba sukhī saba saccarita sundara, nāri nara sisu jaraṭha je ||

दो॰ 28दोहा

उत्तर दिसि सरजू बह, निर्मल जल गम्भीर ।
बाँधे घाट मनोहर, स्वल्प पङ्क नहिँ तीर ॥

uttara disi sarajū baha, nirmala jala gambhīra |
bām̐dhe ghāṭa manohara, svalpa paṅka nahim̐ tīra ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0