उत्तरकाण्ड

अध्याय 27: अयोध्या के भवनों की शोभा

6 श्लोक · 27 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

अयोध्या के भवनों की शोभा

नारद, सनकादि आदि मुनीश्वर प्रतिदिन कोसलपति के दर्शन को आते हैं, और नगर देखकर अपना वैराग्य भूल जाते हैं। अटारियाँ सोने और मणियों की हैं। नगर के चारों ओर परकोटा है, जिसके रंग-बिरंगे कँगूरे ऐसे लगते हैं मानो नवग्रह अमरावती को घेरने आए हों। धरती रंगीन काँच से जड़ी है। उजले महल आकाश छूते हैं। घर-घर में मणियों के दीपक जलते हैं; देहरियाँ मूँगे की, खम्भे सोने और पन्ने के, आँगन स्फटिक के हैं, और हर द्वार पर हीरों से जड़े सोने के किवाड़ हैं। हर घर में रामचरित की चित्रशाला है, जो मुनियों का भी मन चुरा लेती है।

27.1

नारदादि सनकादि मुनीसा । दरसन लागि कोसलाधीसा ॥
दिन प्रति सकल अजोध्या आवहिँ । देखि नगर बिराग बिसरावहिं ॥

nāradādi sanakādi munīsā | darasana lāgi kosalādhīsā ||
dina prati sakala ajodhyā āvahim̐ | dekhi nagara birāga bisarāvahiṃ ||

27.2

जातरूप मनि रचित अटारीं । नाना रङ्ग रुचिर गच ढारीं ॥
पुर चहुँ पास कोट अति सुन्दर । रचे कँगूरा रङ्ग रङ्ग बर ॥

jātarūpa mani racita aṭārīṃ | nānā raṅga rucira gaca ḍhārīṃ ||
pura cahum̐ pāsa koṭa ati sundara | race kam̐gūrā raṅga raṅga bara ||

27.3

नव ग्रह निकर अनीक बनाई । जनु घेरी अमरावति आई ॥
महि बहु रङ्ग रचित गच काँचा । जो बिलोकि मुनिबर मन नाचा ॥

nava graha nikara anīka banāī | janu gherī amarāvati āī ||
mahi bahu raṅga racita gaca kām̐cā | jo biloki munibara mana nācā ||

27.4

धवल धाम ऊपर नल चुंबत । कलस मनहुँ रबि ससि दुति निन्दत ॥
बहु मनि रचित झरोखा भ्राजहिं । गृह गृह प्रति मनि दीप बिराजहिं ॥

dhavala dhāma ūpara nala cuṃbata | kalasa manahum̐ rabi sasi duti nindata ||
bahu mani racita jharokhā bhrājahiṃ | gṛha gṛha prati mani dīpa birājahiṃ ||

27.छं॰ 1छन्द

मनि दीप राजहिँ भवन भ्राजहिं, देहरीं बिद्रुम रची ।
मनि खंभ भीति बिरञ्चि बिरची, कनक मनि मरकत खची ॥
सुन्दर मनोहर मन्दिरायत, अजिर रुचिर फटिक रचे ।
प्रति द्वार द्वार कपाट-पुरट बनाइ बहु बज्रन्हि खचे ॥

mani dīpa rājahim̐ bhavana bhrājahiṃ, deharīṃ bidruma racī |
mani khaṃbha bhīti birañci biracī, kanaka mani marakata khacī ||
sundara manohara mandirāyata, ajira rucira phaṭika race |
prati dvāra dvāra kapāṭa-puraṭa banāi bahu bajranhi khace ||

दो॰ 27दोहा

चारू चित्रसाला गृह, गृह प्रति लिखे बनाई ।
राम चरित जे निरख मुनि, ते मन लेहिँ चोराइ ॥

cārū citrasālā gṛha, gṛha prati likhe banāī |
rāma carita je nirakha muni, te mana lehim̐ corāi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0