उत्तरकाण्ड

अध्याय 25: भाइयों की सेवा, लव-कुश का जन्म

5 श्लोक · 25 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

भाइयों की सेवा, लव-कुश का जन्म

भाई श्रीराम की रुचि के अनुसार सेवा करते हैं, उनकी प्रीति बढ़ती ही जाती है, और वे प्रभु का मुख देखते रहते हैं कि कभी कुछ आज्ञा दें। श्रीराम भाइयों से प्रेम करते और उन्हें नीति सिखाते हैं। नगरवासी देवदुर्लभ भोग भोगते हैं, फिर भी दिन-रात विधाता से केवल रघुवीर के चरणों में प्रीति माँगते हैं। सीता ने दो सुन्दर पुत्रों, लव और कुश, को जन्म दिया, जिनका गान वेद-पुराण करते हैं; वे विजयी, विनम्र और गुणवान हैं, मानो हरि के प्रतिबिम्ब हों। हर भाई के दो-दो पुत्र हुए। जो वाणी, मन और माया से परे, अजन्मा, घनीभूत सच्चिदानन्द हैं, वही यह उदार नर-लीला करते हैं।

25.1

सेवहिँ सानुकूल सब भाई । राम-चरन रति अति अधिकाई ॥
प्रभु सुख कमल बिलोकत रहहीं । कबहुँ कृपाल हमहिँ कछु कहहीं ॥

sevahim̐ sānukūla saba bhāī | rāma-carana rati ati adhikāī ||
prabhu sukha kamala bilokata rahahīṃ | kabahum̐ kṛpāla hamahim̐ kachu kahahīṃ ||

25.2

राम करहिँ भ्रातन्ह पर प्रीती । नाना भाँति सिखावहिँ नीती ॥
हरषित रहहिँ नगर के लोगा । करहिँ सकल सुर-दुर्लभ भोगा ॥

rāma karahim̐ bhrātanha para prītī | nānā bhām̐ti sikhāvahim̐ nītī ||
haraṣita rahahim̐ nagara ke logā | karahim̐ sakala sura-durlabha bhogā ||

25.3

अहनिसि बिधिहि मनावत रहहीँ । श्रीरघुबीर-चरन रति चहहीं ॥
दुइ सुत सुन्दर सीतां जाये । लव कुस बेद पुरानन्ह गाये ॥

ahanisi bidhihi manāvata rahahīm̐ | śrīraghubīra-carana rati cahahīṃ ||
dui suta sundara sītāṃ jāye | lava kusa beda purānanha gāye ||

25.4

दोउ बिजई बिनई गुन मन्दिर । हरि प्रतिबिम्ब मनहुँ अति सुन्दर ॥
दुइ दुइ सुत सब भ्रातन्ह केरे । भए रूप गुन सील घनेरे ॥

dou bijaī binaī guna mandira | hari pratibimba manahum̐ ati sundara ||
dui dui suta saba bhrātanha kere | bhae rūpa guna sīla ghanere ||

दो॰ 25दोहा

दो ज्ञान गिरा गोतीत अज, माया मन गुन पार ।
सोइ सच्चिदानन्द घन, कर नर चरित उदार ॥

do jñāna girā gotīta aja, māyā mana guna pāra |
soi saccidānanda ghana, kara nara carita udāra ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0